Ashfaq Ahmad
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चोल साम्राज्य का इतिहास: प्राचीन चोलों से राजराज और राजेंद्र के समुद्री साम्राज्य तक




चोल साम्राज्य: तमिल भूभाग से हिंद महासागर तक फैली एक महान साम्राज्यवादी शक्ति

चोलों का इतिहास कितना पुराना है?


दक्षिण भारत के इतिहास में चोलों का नाम किसी मध्यकालीन साम्राज्य के साथ अचानक उभरने वाला नाम नहीं है। चोल परंपरा की जड़ें बहुत पुरानी हैं। सम्राट अशोक के शिलालेखों में चोलों का उल्लेख मिलता है। इसका अर्थ है कि तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक चोल दक्षिण भारत की एक स्थापित राजनीतिक शक्ति बन चुके थे। उनके साथ उनके दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी भी लगातार दक्षिण भारतीय राजनीति में उपस्थित थे—चेर और पांड्य।

सामान्य रूप से प्राचीन दक्षिण भारत के राजनीतिक भूगोल को समझने के लिए तीन प्रमुख शक्तियों को इस प्रकार देखा जा सकता है—चोल मुख्यतः तमिल क्षेत्र से, चेर वर्तमान केरल और उसके आसपास के क्षेत्रों से तथा पांड्य सुदूर दक्षिणी तमिल भूभाग, विशेषकर मदुरै और कन्याकुमारी के आसपास के क्षेत्र से जुड़े थे।


दक्षिण भारत की इस प्राचीन राजनीतिक परंपरा में राजसत्ता के उत्तराधिकार और मातृवंशीय परंपराओं के भी उल्लेख मिलते हैं। यूनानी लेखक मेगस्थनीज ने पांड्य राज्य के संबंध में ऐसी परंपरा का उल्लेख किया है जिसमें शासक को हेराक्लीज की पुत्री से जोड़ा गया है। भारतीय इतिहास में यह प्रसंग दक्षिण भारत की उन प्राचीन राजनीतिक परंपराओं की ओर संकेत करता है, जिनमें स्त्री और मातृवंश की भूमिका उत्तर भारत की तत्कालीन राजपरंपराओं से अलग दिखाई देती है।

संगम युग और चोल शक्ति


पहली शताब्दी ईसा पूर्व में कलिंग के शासक खारवेल के हाथीगुंफा अभिलेख में लगभग ११३ वर्ष पुराने तमिल संघ का उल्लेख मिलता है। इस उल्लेख की व्याख्या तमिल क्षेत्र की उस राजनीतिक-सांस्कृतिक एकता और शक्ति के संदर्भ में की जाती है जिसे बाद में संगम युग के रूप में जाना गया।

संगम साहित्य में चोलों की राजनीतिक और सैन्य शक्ति के अनेक उल्लेख मिलते हैं। चोल शासक करिकाल का नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। दूसरी शताब्दी ईस्वी के आसपास माने जाने वाले करिकाल को परंपरा में एक शक्तिशाली शासक और समुद्री शक्ति के विकास से जोड़कर देखा जाता है। इससे पता चलता है कि दक्षिण भारत में समुद्री व्यापार और नौसैनिक गतिविधियाँ बाद के साम्राज्यवादी चोलों के उदय से कई शताब्दियाँ पहले ही महत्वपूर्ण हो चुकी थीं।

चोल, चेर और पांड्य केवल स्थल-आधारित राजसत्ताएँ नहीं थे। इनका संपर्क समुद्री व्यापार की उस विस्तृत दुनिया से था, जिसमें रोमन साम्राज्य भी एक प्रमुख भागीदार था। दक्षिण भारत के विभिन्न पुरातात्त्विक स्थलों से बड़ी संख्या में रोमन सिक्के मिले हैं। रोमन शराब के लिए इस्तेमाल होने वाली एम्फोरा के अवशेष भी इस व्यापारिक संपर्क के प्रमाण हैं।

इस प्रकार दक्षिण भारत और रोमन भूमध्यसागरीय संसार के बीच व्यापार केवल साहित्यिक उल्लेखों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसके पुरातात्त्विक प्रमाण भी उपलब्ध हैं।

पल्लवों के बाद चोलों का पुनरुत्थान


संगम युग के बाद कई शताब्दियों तक चोल राजनीतिक परिदृश्य में पहले जैसी प्रमुख शक्ति के रूप में दिखाई नहीं देते। इस बीच दक्षिण भारत की राजनीति में पल्लवों का प्रभाव बढ़ा। तीसरी शताब्दी ईस्वी के बाद पल्लव तमिल क्षेत्र की प्रमुख शक्तियों में शामिल हो गए और लंबे समय तक उनका प्रभुत्व बना रहा।

चोलों का पुनरुत्थान नौवीं शताब्दी में विजयालय के उदय के साथ हुआ। लगभग ८५० ईस्वी के आसपास विजयालय ने चोल शक्ति को पुनः राजनीतिक महत्व प्रदान किया। इससे पहले चोल शासक पल्लवों के सामंत के रूप में भी शासन करते रहे थे।

विजयालय के बाद चोल शक्ति लगातार बढ़ती गई। उनके वंशजों ने पल्लवों को पीछे धकेलते हुए तमिल क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थापित किया। परांतक प्रथम ने पांड्य राजधानी मदुरै पर अधिकार कर अपनी राजनीतिक शक्ति को और विस्तृत किया तथा पल्लव सत्ता का अंतिम अंत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

फिर भी उस समय दक्षिण भारत की शक्ति-संरचना केवल चोलों के हाथ में नहीं थी। दक्कन में राष्ट्रकूट और मैसूर क्षेत्र में गंग शासक अभी भी महत्वपूर्ण शक्तियाँ थे। इसलिए चोल साम्राज्य के वास्तविक उत्कर्ष की भूमिका अभी तैयार हो रही थी।

राजराज प्रथम और चोल साम्राज्य का उत्कर्ष


इसके बाद चोल इतिहास में वह दौर आया जिसने इस राजवंश को दक्षिण भारतीय इतिहास की सबसे प्रभावशाली साम्राज्यवादी शक्तियों में स्थापित कर दिया। राजराज प्रथम का शासन इसी परिवर्तन का निर्णायक चरण था।

राजराज प्रथम ने चोल सैन्य शक्ति को व्यापक रूप दिया। उनके शासन में श्रीलंका के विरुद्ध अभियान शुरू हुआ और उसके बड़े हिस्से पर चोल अधिकार स्थापित हुआ। मालदीव पर भी चोलों ने अपना प्रभाव स्थापित किया।

इन अभियानों के साथ चोलों की नौसैनिक शक्ति एक नए स्तर पर पहुँची। समुद्र केवल व्यापार का मार्ग नहीं रहा, बल्कि साम्राज्य विस्तार का साधन भी बन गया। राजराज ने पश्चिमी तट, आंध्र क्षेत्र और दक्कन की विभिन्न शक्तियों के विरुद्ध भी सैन्य अभियान चलाए।

उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा को उनकी उपाधियों से भी समझा जा सकता है। उन्हें चोल मार्तंड और चोलेन्द्रसिंह जैसी उपाधियों से संबोधित किया गया।

राजराज प्रथम ने जिस चोल साम्राज्य की नींव को मजबूत किया, उसके विस्तार को उनके उत्तराधिकारी राजेंद्र प्रथम ने अभूतपूर्व ऊँचाई तक पहुँचाया।

राजेंद्र प्रथम और गंगा तक चोल विजय


राजेंद्र प्रथम अपने पिता राजराज प्रथम से भी आगे बढ़े। श्रीलंका पर चोल अधिकार को उन्होंने और मजबूत किया तथा पूरे द्वीप पर नियंत्रण स्थापित करने का अभियान चलाया। श्रीलंका के शासक को बंदी बनाकर चोल क्षेत्र में लाया गया, जहाँ लंबे समय बाद उसकी मृत्यु हुई।

इसके बाद चोल सेना ने आंध्र से आगे बढ़ते हुए कलिंग की ओर अभियान किया। वहाँ से आगे बढ़ते हुए चोल सेना ने बंगाल तक पहुँचकर पाल शासक महिपाल को पराजित किया।

इस विजय की स्मृति को राजेंद्र ने केवल सैन्य उपलब्धि के रूप में नहीं छोड़ा। गंगा से पवित्र जल दक्षिण भारत लाया गया और इसी उपलब्धि के आधार पर उन्होंने ‘गंगैकोंड’ की उपाधि धारण की। गंगैकोंडचोलपुरम नामक नई राजधानी की स्थापना भी इसी राजनीतिक विजय की स्मृति से जुड़ी थी।

यह अभियान चोल साम्राज्य की उस असाधारण सैन्य पहुँच को दर्शाता है जिसमें दक्षिण भारत की एक शक्ति ने भारतीय उपमहाद्वीप के पूर्वी और उत्तरी हिस्सों तक अपनी सेना भेजी।



हिंद महासागर में चोल नौसैनिक शक्ति


राजेंद्र प्रथम की महत्वाकांक्षा केवल भारतीय भूभाग तक सीमित नहीं रही। चोल नौसेना ने दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर भी अभियान चलाए।

मलय प्रायद्वीप, सुमात्रा और जावा से जुड़े क्षेत्रों में चोल सैन्य अभियान हुए। उस समय दक्षिण-पूर्व एशिया में श्रीविजय एक महत्वपूर्ण समुद्री शक्ति थी। चोलों के अभियान ने इस क्षेत्र की व्यापारिक और राजनीतिक व्यवस्था पर भी प्रभाव डाला।

शैलेन्द्र वंश से जुड़े शासक विजयोतुंग वर्मन को चोल अभियान के दौरान बंदी बनाए जाने का उल्लेख मिलता है। बाद में उसकी अधीनता स्वीकार करने के बाद उसे शासन वापस दिए जाने की परंपरा का उल्लेख किया जाता है।

इन अभियानों से यह स्पष्ट होता है कि चोल नौसेना केवल तटीय रक्षा तक सीमित नहीं थी। उसका उपयोग समुद्री व्यापार मार्गों और हिंद महासागर की व्यापक राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में चोल प्रभाव स्थापित करने के लिए भी किया गया।

चोलों के चीन के साथ भी व्यापारिक और राजनयिक संबंध थे। उनके द्वारा चीन में राजदूत भेजे जाने के प्रमाण मिलते हैं। इस प्रकार चोल साम्राज्य की समुद्री गतिविधियाँ भारत के तट से निकलकर दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया की व्यापारिक दुनिया तक पहुँचती थीं।

विद्रोह और चोलों का कठोर दमन


जब राजेंद्र प्रथम की सेनाएँ उत्तर और समुद्र पार के अभियानों में व्यस्त थीं, उसी समय चोल साम्राज्य के भीतर भी विद्रोह होने लगे। पांड्य और चेर क्षेत्रों में असंतोष उभरा और श्रीलंका में भी चोल सत्ता के विरुद्ध विरोध बढ़ने लगा।

इन विद्रोहों को दबाने का दायित्व राजेंद्र ने युवराज राजाधिराज को दिया। चोल सेना ने इन विद्रोहों का अत्यंत कठोर सैन्य दमन किया। मध्यकालीन साम्राज्यों के इतिहास में यह कोई असामान्य घटना नहीं थी, लेकिन चोल अभिलेखों और विरोधी राजवंशों के स्रोतों में दर्ज इन अभियानों से साम्राज्यवादी शासन की कठोरता भी सामने आती है।

यहीं से चोल इतिहास का एक दूसरा पक्ष दिखाई देता है। चोलों को केवल स्थापत्य, समुद्री व्यापार और प्रशासन की उपलब्धियों के आधार पर देखना उतना ही अधूरा होगा, जितना उनके सैन्य अभियानों को ही उनकी पूरी पहचान मान लेना।

धर्म और राजनीतिक संघर्ष


दक्षिण भारत के मध्यकालीन इतिहास में राजनीतिक संघर्षों को धार्मिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करना आसान है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल थी।

यह कहना गलत होगा कि धार्मिक संघर्ष कभी नहीं हुए। शैव और वैष्णव परंपराओं के बीच कई कालखंडों में तीखे मतभेद सामने आए। बौद्ध और जैन समुदाय भी कुछ परिस्थितियों में हिंसा और दमन का सामना करते रहे। लेकिन दूसरी ओर, लंबे समय तक विभिन्न धार्मिक परंपराओं के संस्थानों को राजकीय और स्थानीय दान भी मिलता रहा।

इसका एक कारण यह था कि मध्यकालीन दक्षिण भारत में धार्मिक संस्थाएँ केवल पूजा के केंद्र नहीं थीं। वे शिक्षा, भूमि-व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, सामाजिक संगठन और स्थानीय प्रशासन से भी जुड़ी हुई थीं। इसलिए राजकीय संरक्षण के लिए प्रतिस्पर्धा को केवल धार्मिक आस्था के संघर्ष के रूप में देखना ऐतिहासिक परिस्थिति को अत्यधिक सरल बना देगा।

राजसत्ता और धार्मिक संस्थानों के संबंधों में संरक्षण, आर्थिक हित और राजनीतिक वैधता तीनों महत्वपूर्ण तत्व थे।

चोल और चालुक्यों का संघर्ष


चोल इतिहास के सबसे कठोर सैन्य प्रसंगों में से एक उनका पश्चिमी चालुक्यों के साथ संघर्ष था। राजेंद्र प्रथम और उसके उत्तराधिकारी राजाधिराज के समय चोल-चालुक्य संघर्ष चरम पर पहुँचा।

चोल सेनाओं ने कल्याणी, अर्थात पश्चिमी चालुक्यों की राजधानी, पर आक्रमण किया। चालुक्य अभिलेखों में इस अभियान के दौरान हुई लूट, नगर के विनाश और व्यापक हिंसा का उल्लेख मिलता है। युद्ध के दौरान स्त्रियों, बच्चों और बड़ी संख्या में ब्राह्मणों की हत्या किए जाने के आरोप भी विरोधी पक्ष के अभिलेखों में दर्ज हैं।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि मध्यकालीन राजवंशों के अभिलेख प्रायः अपने राजनीतिक पक्ष और शत्रु की छवि के अनुसार घटनाओं का वर्णन करते थे। इसलिए ऐसे विवरणों को अन्य स्रोतों के साथ मिलाकर पढ़ना आवश्यक है। फिर भी इन अभिलेखों से युद्धों की व्यापक हिंसा और साम्राज्यवादी संघर्ष की वास्तविकता को नकारा नहीं जा सकता।

चोलों से पहले पल्लवों और चालुक्यों के बीच भी ऐसे ही विनाशकारी युद्ध हुए थे। दक्षिण भारत की राजनीतिक परंपरा में राजधानी पर आक्रमण, मंदिरों और राजकीय प्रतिष्ठानों की लूट तथा शत्रु क्षेत्र में व्यापक सैन्य विनाश असामान्य घटनाएँ नहीं थीं।

इसी क्रम में कलभ्रों का उल्लेख भी आता है। कलभ्रों को प्रायः बौद्ध और जैन परंपराओं से जोड़ा जाता है और दक्षिण भारत के एक कालखंड में उन्होंने चेर, चोल तथा पांड्य राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती दी थी। बाद में पल्लवों, पांड्यों और अन्य स्थानीय शक्तियों ने पुनः अपना प्रभुत्व स्थापित किया।



युद्धों के बीच धार्मिक सह-अस्तित्व


इन संघर्षों के बावजूद दक्षिण भारत की धार्मिक स्थिति को लगातार धार्मिक युद्धों की स्थिति के रूप में चित्रित करना भी उचित नहीं होगा।

चोल काल में शैव, वैष्णव, जैन और बौद्ध परंपराओं से जुड़े स्थापत्य, मूर्तिकला और धार्मिक संस्थानों के प्रमाण मिलते हैं। अनेक मंदिरों और धार्मिक संस्थानों को भूमि तथा अन्य प्रकार के दान दिए गए। इससे यह संकेत मिलता है कि राजनीतिक संघर्षों और धार्मिक संस्थाओं के बीच संबंध हमेशा एक जैसे नहीं थे।

एक ही राजवंश के शासन में किसी समय किसी धार्मिक संस्था को संरक्षण मिल सकता था और किसी दूसरे राजनीतिक संघर्ष में धार्मिक पहचान राजनीतिक विरोध का हिस्सा बन सकती थी।

चोल इतिहास इसलिए केवल मंदिरों और मूर्तियों का इतिहास नहीं है, और न ही केवल युद्धों और विजय अभियानों का। यह सत्ता, धर्म, व्यापार, समुद्री शक्ति, कला, प्रशासन और क्षेत्रीय राजनीति के आपस में जुड़े हुए विकास की कहानी है।

तंजावुर के दारासुरम मंदिर से संबंधित एक तमिल अभिलेख इस राजनीतिक-सैन्य इतिहास की एक दिलचस्प स्मृति प्रस्तुत करता है। उसमें कल्याणपुर अर्थात चालुक्यों की राजधानी को जलाने के बाद श्रीविजयराजेंद्र द्वारा लाए गए द्वारपाल की स्थापना का उल्लेख मिलता है। ऐसे अभिलेख बताते हैं कि युद्ध में प्राप्त वस्तुएँ और प्रतीक भी विजयी शासक की राजनीतिक स्मृति और प्रतिष्ठा का हिस्सा बनाए जाते थे।

चोल साम्राज्य की ऐतिहासिक विरासत


चोल साम्राज्य का इतिहास इसलिए विशेष है क्योंकि इसकी जड़ें अत्यंत प्राचीन दक्षिण भारतीय राजनीतिक परंपरा में थीं, लेकिन इसका साम्राज्यवादी रूप मध्यकाल में अपने चरम पर पहुँचा।

अशोक के समय के चोलों से लेकर संगम युग के करिकाल, विजयालय के पुनरुत्थान, राजराज प्रथम की सैन्य और नौसैनिक शक्ति तथा राजेंद्र प्रथम के गंगा से दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैले अभियानों तक चोल इतिहास कई अलग-अलग चरणों से गुजरता है।

राजराज और राजेंद्र के समय चोल साम्राज्य ने यह दिखाया कि दक्षिण भारत की कोई शक्ति केवल उपमहाद्वीप के भीतर ही नहीं, बल्कि हिंद महासागर की समुद्री राजनीति में भी प्रभावशाली भूमिका निभा सकती थी।

लेकिन इसी इतिहास का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। साम्राज्य का विस्तार युद्धों, विद्रोहों के दमन, प्रतिद्वंद्वी राजधानियों के विनाश और राजनीतिक प्रभुत्व की कठोर प्रतिस्पर्धा के साथ हुआ। इसलिए चोलों को केवल महान विजेताओं या केवल धार्मिक-सांस्कृतिक संरक्षकों के रूप में देखना उनके इतिहास को अधूरा कर देता है।

चोल साम्राज्य को समझने के लिए उसके मंदिरों जितना ही महत्वपूर्ण उसकी नौसेना है, उसकी व्यापारिक समृद्धि जितनी ही महत्वपूर्ण उसकी सैन्य शक्ति है और उसकी सांस्कृतिक उपलब्धियों जितना ही महत्वपूर्ण उसके युद्धों का इतिहास भी है। यही विरोधाभास चोल इतिहास को दक्षिण भारतीय इतिहास के सबसे समृद्ध और जटिल अध्यायों में से एक बनाता है।

 

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