Ashfaq Ahmad
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जन जागरण, अंधविश्वास और बाबावाद : आर्थिक विकास के साथ बढ़ता धार्मिक बाजार

 

जन जागरण : अंधविश्वास, धार्मिक बाजार और बाबावाद का विस्तार

यदि किसी समाज का आर्थिक विकास उसके बौद्धिक विकास की अपेक्षा अधिक तेजी से हो, तो वह समाज अंधविश्वासों में और भी गहरे धँसता चला जाता है। फिर उस समाज में लोगों के अंधविश्वास का फायदा उठाकर अपना घर भरने वाले परजीवियों का साम्राज्य विकसित होने लगता है। भारत के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ।


१९९० के दशक में उदारीकरण के बाद मध्यम वर्ग के लोगों के जीवन स्तर में तेजी से सुधार हुआ। इससे पहले जहाँ टेलीविजन, फ्रिज और स्कूटर जैसे सुख-साधन कुछ खास लोगों की पहुँच में ही हुआ करते थे, वहीं इसके बाद ये आम लोगों की पहुँच में भी आने लगे। जब लोगों की आमदनी बढ़ी तो बाजार भी तरह-तरह के उत्पादों से पट गया।


इसके बाद स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ और अधिक साधन-संपन्न दिखाने की होड़ शुरू हुई। इस होड़ ने मध्यम वर्ग की अपेक्षाकृत शांत जिंदगी में खलबली मचा दी। एक ऐसी दौड़ शुरू हो गई जिसमें सबको आगे निकलना था।


महत्वाकांक्षाओं से संचालित इस दौड़ ने लोगों के मन में भय, असुरक्षा और लालच को जन्म दिया। लालच से भरे और डरे हुए लोग परजीवियों के लिए आसान शिकार थे। और इस शिकार के लिए उन्हें कोई विशेष प्रयास करने की आवश्यकता भी नहीं थी। उन्हें तो बस अपना मुँह खोलकर बैठ जाना था, क्योंकि शिकार खुद चलकर उनके पास आ रहा था।


इसी दौरान लोगों द्वारा धार्मिक कार्यों में किया जाने वाला खर्च अचानक बहुत बढ़ गया। पहले जहाँ धार्मिक आयोजन के नाम पर सत्यनारायण की कथा हुआ करती थी, वहीं अब माता के जागरण जैसे भव्य आयोजन होने लगे।


ऐसे आयोजनों ने लोगों को अपनी संपन्नता और धार्मिकता के प्रदर्शन का अवसर तो दिया ही, साथ ही दैवीय कृपा प्राप्त कर लेने का आश्वासन भी दिया। देखते ही देखते देश भर में जागरण पार्टियों की बाढ़ आ गई। इसके साथ ही धार्मिक पर्यटन और मंदिरों की आय में भी भारी वृद्धि हुई।


इससे पहले जहाँ लोग जीवन में एक बार तीर्थयात्रा कर लेने को उपलब्धि मानते थे, वहीं अब तीर्थयात्राएँ पिकनिक की तरह होने लगीं। यहाँ तक कि बद्रीनाथ, केदारनाथ और अमरनाथ जैसे दुर्गम तीर्थस्थलों पर भी लोग हर वर्ष हाजिरी देने जाने लगे।


जो लोग थोड़े कम साहसी थे, उन्होंने अपने आसपास ही किसी धर्मस्थल को चुन लिया, जहाँ वे नियमित अंतराल पर हाजिरी लगाने जाने लगे। मथुरा-वृंदावन इसका एक उदाहरण है, जहाँ हर सप्ताहांत आसपास के क्षेत्रों से लोग पहुँच जाते हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या दिल्ली-एनसीआर के संपन्न लोगों की होती है। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो हर सप्ताह दिल्ली से बिना नागा वहाँ हाजिरी देने पहुँचते हैं।


विशेष अवसरों पर यहाँ इतनी भीड़ जुटती है कि व्यवस्था चरमरा जाती है। तीर्थयात्रियों की बढ़ती भीड़ को भुनाने के लिए पिछले कुछ वर्षों के दौरान यहाँ कई भव्य मंदिरों का निर्माण भी हुआ है।


कथावाचकों और बाबाओं का विस्तार


इसके साथ ही कथावाचकों और प्रवचनकर्ताओं का धंधा भी चल निकला। कथावाचकों के पंडालों में भीड़ उमड़ने लगी। आसाराम तथा उसके जैसे कई अन्य कथावाचकों ने इस अवसर का जमकर लाभ उठाया और स्वयं को धर्म तथा अध्यात्म के बाजार में एक ब्रांड की तरह स्थापित कर लिया।


उनके अनुयायियों की भारी भीड़ ने उन्हें शोहरत और राजनीतिक ताकत के साथ-साथ ढेर सारा धन भी दिया। इस धन का उपयोग उन्होंने अपने प्रचार के लिए किया और इसके जरिये प्रचार के सबसे सशक्त माध्यम टेलीविजन तक अपनी पहुँच बना ली।


अब इनके कार्यक्रम टेलीविजन पर प्रसारित होने लगे। लगभग सभी प्रमुख चैनलों पर सुबह का समय इनके लिए बुक हो गया। टेलीविजन पर आना इनके लिए बेहद फायदे का सौदा साबित हुआ। इसके जरिये उन्होंने घर-घर तक अपनी पहुँच बना ली और उनके अनुयायियों की संख्या के साथ-साथ लाभ में भी अप्रत्याशित वृद्धि हुई।


इसने मीडिया जगत के कुछ लोगों के कान भी खड़े कर दिए। वे भी धर्म और अध्यात्म की बहती गंगा में लाभ की संभावनाएँ तलाशने लगे।



धार्मिक चैनलों का बाजार


मुंबई में एक प्रोडक्शन हाउस चला रहे भूतपूर्व पत्रकार माधव कांत मिश्रा ने इस संभावना को सबसे पहले पहचाना और वर्ष २००० में ‘आस्था’ नामक चैनल लॉन्च कर दिया।


इस चैनल ने जनता तक अपनी पहुँच बनाने के लिए बेताब अनेक गुरुओं और कथावाचकों के लिए संभावनाओं के द्वार खोल दिए। शुरुआत में इस चैनल पर प्रसारित होने वाली सामग्री के लिए कोई कीमत नहीं वसूली जाती थी। लेकिन बढ़ती माँग ने इसे ज्यादा दिनों तक मुफ्त नहीं रहने दिया।


ऐसे बाबाओं और गुरुओं की कोई कमी नहीं थी जो खुद को टेलीविजन पर दिखाने के लिए अच्छी-खासी कीमत देने को तैयार थे। इस बढ़ती माँग को भुनाने के लिए धड़ाधड़ धार्मिक चैनल लॉन्च होने लगे। इनमें अधिकांश का स्वामित्व किसी न किसी धर्मगुरु के पास ही था।


इस तरह इन चैनलों के जरिये वे दोहरा लाभ कमाने लगे। ‘आस्था’ चैनल के स्वामित्व को भी बाद में बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने खरीद लिया। बाबा रामदेव को योगगुरु से एक सफल व्यवसायी के रूप में स्थापित करने में इस चैनल की बड़ी भूमिका रही।


टेलीविजन के जरिये होने वाले प्रचार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि आप सीधे लक्षित उपभोक्ताओं तक पहुँच बना सकते हैं। आज के दौर में टेलीविजन देखने में अधिक समय व्यतीत करने वाले अधिकांश लोग औसत बुद्धि के ही होते हैं। उनमें भी जो लोग धार्मिक चैनल देखते हैं, वे तो बुद्धि में औसत से भी नीचे होते हैं। ऐसे लोगों को आसानी से बुद्धू बनाया जा सकता है।


ज्योतिष और वास्तु का बाजार


इन चैनलों ने जजमानी करके गुजारा कर रहे ज्योतिषाचार्यों को भी संभावनाओं का एक नया रास्ता दिखाया। जीवन की दौड़ में आगे निकलने को लालायित और जीवन की अनिश्चितताओं से डरे हुए लोग अपना भविष्य जान लेने को आतुर थे।


वे हर संभव तरकीब आजमा लेना चाहते थे, जिससे किसी तरह समृद्धि हासिल कर सकें और जीवन की अनिश्चितताओं को लेकर संतुष्ट हो सकें।


ऐसे लोगों का दोहन करने के लिए ज्योतिषी, वास्तुशास्त्री, हस्तरेखा विशेषज्ञ, तांत्रिक और टैरो कार्ड रीडर जैसे परजीवी तैयार बैठे थे। टेलीविजन उन्हें अपने प्रचार का मंच उपलब्ध करा ही चुका था।


कुछ ही समय में धार्मिक चैनलों पर ज्योतिष के कार्यक्रमों की लाइन लग गई। फुटपाथ पर बिकने वाली ज्योतिष की चार किताबें पढ़कर अपनी वाक्पटुता और लोगों को ठगने की कला में निपुण लोग टेलीविजन पर खरीदे हुए स्लॉट के जरिये प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य बन गए।


टेलीविजन के जरिये ज्योतिष का इतना अंधाधुंध प्रचार हुआ कि लोग हर छोटी-बड़ी बात के लिए ज्योतिषियों के पास भागने लगे। नई कार निकालने से लेकर बच्चे के जन्म का मुहूर्त तक ज्योतिष के आधार पर निर्धारित किया जाने लगा।


लोग अपने घर का नक्शा बनवाने के लिए वास्तुशास्त्रियों को आर्किटेक्ट की अपेक्षा अधिक महत्व देने लगे और जिनके घर बन चुके थे, वे अपने घर को वास्तु के अनुसार ठीक कराने के लिए तोड़फोड़ तक करवाने लगे।


अब लगभग सभी लोगों के हाथों में रत्न और गले में तरह-तरह के लॉकेट दिखाई देने लगे। ग्रहों को प्रसन्न करने के लिए लोग ज्योतिषियों की सलाह पर महँगे पूजा-पाठ, मंत्र-जाप और हवन आदि करवाने लगे।


टेलीविजन पर ठगी का विस्तार


ये चैनल ठगों के लिए इतना उपयोगी माध्यम साबित हुए कि कल तक अखबारों के वर्गीकृत विज्ञापनों, बसों, ट्रेनों और सार्वजनिक शौचालयों में पर्चे चिपकाकर अपना प्रचार करने वाले बाबा बंगाली भी टेलीविजन पर अपनी दुकान खोलकर बैठ गए।


फिर समोसे को लाल-हरी चटनी से खाने पर भी कृपा आने लगी। बस स्टैंड के पीछे पीपल के पेड़ के नीचे मर्दाना कमजोरी का इलाज करने वाले हकीम जी भी टेलीविजन पर पहुँच गए।


मोटापा, मधुमेह, कैंसर, माइग्रेन, अस्थमा जैसी बीमारियों के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के नाम पर तरह-तरह के उत्पाद बेचे जाने लगे। जिन लोगों ने कभी कॉलेज का मुँह भी नहीं देखा, वे भी टेलीविजन पर डॉक्टर साहब, वैद्य जी और हकीम जी के नाम से प्रसिद्ध हो गए।


अंधविश्वास और बाबावाद का सामाजिक प्रभाव


बहरहाल, यह दौर अभी भी जारी है और निकट भविष्य में इसमें किसी बड़े बदलाव के आसार फिलहाल दिखाई नहीं दे रहे हैं। अंधविश्वास का जहर आज भी लगातार विभिन्न माध्यमों से समाज में फैलाया जा रहा है।


भारत में तेजी से पैर पसारते बाबावाद के पीछे यही प्रचार जिम्मेदार है। इसका पैसा भले ही अमीरों की जेब से आता हो, लेकिन इससे सबसे ज्यादा नुकसान निम्न वर्ग के लोगों का हुआ है।


रईस लोगों ने तो केवल अपना कुछ धन खोया, लेकिन वे गरीब लोग, जो किसी तरह कठिनाइयों में अपना जीवनयापन कर रहे थे, अपना सब कुछ लुटा बैठे। जिन बाबाओं और गुरुओं को वे ईश्वर के समकक्ष मानकर अपने उद्धार की आशा कर रहे थे, उन्होंने न केवल उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से ठगा, बल्कि उनकी बहन-बेटियों की इज्जत भी तार-तार कर डाली।


यही वह बिंदु है जहाँ धार्मिक आस्था और अंधविश्वास के बीच का अंतर सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। जब भय, लालच और असुरक्षा से घिरा व्यक्ति अपने विवेक के बजाय किसी कथित चमत्कार या दैवीय आश्वासन पर निर्भर होने लगता है, तब उसके शोषण की संभावनाएँ भी बढ़ जाती हैं। और जब इस शोषण को बाजार, मीडिया और प्रचार की ताकत मिल जाती है, तो वह व्यक्तिगत ठगी से आगे बढ़कर एक व्यापक सामाजिक व्यवस्था का रूप लेने लगता है।


नोट : इस तरह की जानकारियों से भरे वीडियो आप मेरे यूट्यूब चैनल Arpit Explains पर भी देख सकते हैं।

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