Ashfaq Ahmad
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चमगादड़ इतने वायरस के प्राकृतिक आश्रयदाता क्यों हैं? जानिए इसके पीछे का विज्ञान

 


चमगादड़ और वायरस: आखिर इन उड़ने वाले स्तनधारियों में ऐसा क्या खास है?


मनुष्य और वायरस का रिश्ता बहुत पुराना है। पृथ्वी पर मौजूद अनगिनत विषाणुओं में से कुछ मनुष्यों में गंभीर बीमारियाँ पैदा कर सकते हैं, जबकि अनेक ऐसे भी हैं जिनका मनुष्य से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता।


जब भी किसी नए संक्रामक रोग का स्रोत किसी जंगली जीव से जुड़ता है, तो एक नाम बार-बार सामने आता है—चमगादड़।


चमगादड़ों में अनेक ऐसे विषाणु पाए गए हैं जो मनुष्यों और दूसरे स्तनधारियों में गंभीर बीमारी पैदा कर सकते हैं। निपाह, हेंड्रा, मारबर्ग और कुछ कोरोना वायरस इसके प्रमुख उदाहरण हैं।


लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।


चमगादड़ “ज्यादातर वायरस के वाहक” नहीं हैं।


दुनिया में हजारों प्रकार के वायरस मौजूद हैं और उनके प्राकृतिक आश्रयदाता भी बहुत अलग-अलग जीव हैं। चमगादड़ केवल उन पशु समूहों में से एक हैं जिनमें विषाणुओं की असाधारण विविधता पाई जाती है।


तो फिर वैज्ञानिक चमगादड़ों को लेकर इतने गंभीर क्यों हैं?


इसका उत्तर उनके शरीर, उनकी उड़ान और उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली में छिपा है।


चमगादड़ इतने असाधारण जीव क्यों हैं?


चमगादड़ स्तनधारियों में सबसे अलग जीवों में गिने जाते हैं।


वे मनुष्य की तरह अपने शरीर के भीतर बच्चों को जन्म देते हैं और अपने बच्चों को दूध पिलाते हैं, लेकिन स्तनधारियों में वे एकमात्र ऐसे जीव हैं जो सक्रिय रूप से उड़ सकते हैं।


दुनिया में चमगादड़ों की लगभग १,४०० से अधिक ज्ञात प्रजातियाँ हैं। वे अंटार्कटिका को छोड़कर लगभग पूरी दुनिया में पाए जाते हैं और उनके आकार, भोजन, आवास तथा जीवनशैली में बहुत विविधता है।


कुछ चमगादड़ कीट खाते हैं, कुछ फल और फूलों का रस लेते हैं, कुछ मछली या छोटे जीवों का शिकार करते हैं और कुछ विशेष प्रजातियाँ रक्त पर निर्भर होती हैं।


इस विशाल विविधता का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि वायरसों को भी अलग-अलग प्रकार के चमगादड़ मेजबान के रूप में उपलब्ध होते हैं।


लेकिन केवल इतनी विविधता से पूरी कहानी समझ में नहीं आती।


चमगादड़ वायरस से बीमार क्यों नहीं पड़ते?


यही वह सवाल है जिसने वैज्ञानिकों को सबसे अधिक आकर्षित किया है।


कई ऐसे वायरस जो मनुष्यों में गंभीर बीमारी पैदा कर सकते हैं, चमगादड़ों में अपेक्षाकृत कम बीमारी या बिना स्पष्ट बीमारी के पाए गए हैं।


इसका अर्थ यह नहीं है कि चमगादड़ों को वायरस से कोई नुकसान नहीं होता।


बल्कि उनके शरीर में एक असाधारण संतुलन दिखाई देता है।


उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस के खिलाफ प्रभावी प्रतिक्रिया देने में सक्षम है, लेकिन वह कई परिस्थितियों में उस अत्यधिक सूजन को भी नियंत्रित रखती है जो मनुष्यों में गंभीर बीमारी और अंगों को नुकसान पहुँचा सकती है।


यानी चमगादड़ का शरीर केवल वायरस से लड़ता नहीं है, बल्कि वायरस से लड़ते समय होने वाली अपनी प्रतिरक्षा-प्रतिक्रिया को भी नियंत्रित करता है।


इसी संतुलन को वैज्ञानिक भाषा में प्रतिरक्षा-सहनशीलता कहा जा सकता है।


इंटरफेरॉन की क्या भूमिका है?


वायरस के संक्रमण के दौरान शरीर की शुरुआती सुरक्षा में इंटरफेरॉन नामक संकेतकारी प्रोटीन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


कई चमगादड़ प्रजातियों में कुछ प्रकार के इंटरफेरॉन और उनसे जुड़े प्रतिरक्षी जीनों की गतिविधि अन्य स्तनधारियों की तुलना में अलग पाई गई है।


यह व्यवस्था वायरस के विरुद्ध शुरुआती सुरक्षा प्रदान कर सकती है, जबकि दूसरी ओर चमगादड़ों में अत्यधिक सूजन पैदा करने वाली प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित रखने की क्षमता भी दिखाई देती है।

यानी उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली को केवल “कमजोर” कहना गलत होगा।


वास्तव में कई अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि चमगादड़ों की प्रतिरक्षा प्रणाली कुछ मामलों में मजबूत प्रतिरक्षी सुरक्षा और नियंत्रित सूजन—दोनों के बीच असाधारण संतुलन बनाती है।

यही बात उन्हें वायरस के लिए एक प्रभावी प्राकृतिक आश्रयदाता बना सकती है।


उड़ने की क्षमता का इससे क्या संबंध है?


यह चमगादड़ों की सबसे दिलचस्प विशेषताओं में से एक है।


उड़ान के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। चमगादड़ की कोशिकाओं में अत्यधिक चयापचय गतिविधि होती है और इसके दौरान ऐसे उप-उत्पाद बन सकते हैं जो सामान्य परिस्थितियों में कोशिकाओं को नुकसान पहुँचा सकते हैं।


इनमें प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन और कोशिकीय क्षति से जुड़े अणु शामिल हैं।


वैज्ञानिकों का मानना है कि लाखों वर्षों के विकास के दौरान चमगादड़ों को ऐसी क्षति से निपटने के लिए विशेष अनुकूलन विकसित करने पड़े।


यही अनुकूलन उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली को भी प्रभावित कर सकते हैं।


उदाहरण के लिए, चमगादड़ों में कोशिकीय क्षति और सूजन से जुड़ी कुछ प्रतिरक्षी प्रणालियाँ अन्य स्तनधारियों की तुलना में अलग ढंग से नियंत्रित होती हैं।


इसका संभावित लाभ यह है कि वायरस मौजूद होने के बावजूद शरीर में वह अत्यधिक सूजन नहीं पैदा होती जो कई बार स्वयं रोगी के ऊतकों को नुकसान पहुँचाती है।


इसलिए यह कहना अधिक सही है कि उड़ान से जुड़े विकासवादी अनुकूलनों ने चमगादड़ों की प्रतिरक्षा प्रणाली को आकार देने में भूमिका निभाई हो सकती है।


हालाँकि वैज्ञानिक अभी भी इस संबंध के सभी पहलुओं को पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं।


क्या चमगादड़ों की प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस को पहचानती ही नहीं?


नहीं।


मूल रूप से प्रचलित यह धारणा कि चमगादड़ों की प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस को पहचानती ही नहीं या उनका प्रतिरक्षा तंत्र “कमजोर” है, वैज्ञानिक रूप से बहुत सरल व्याख्या है।


चमगादड़ वायरस की पहचान कर सकते हैं और उनके शरीर में प्रभावी प्रतिरक्षी प्रतिक्रियाएँ होती हैं।

विशेष अंतर इस बात में दिखाई देता है कि उनका शरीर उस प्रतिक्रिया को किस तरह नियंत्रित करता है।


कुछ प्रतिरक्षी मार्गों की गतिविधि कम या अलग ढंग से नियंत्रित होती है, जबकि कुछ एंटीवायरल प्रणालियाँ अपेक्षाकृत सक्रिय रह सकती हैं।


विशेष रूप से कोशिकीय क्षति से उत्पन्न संकेतों के प्रति अत्यधिक सूजन वाली प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने की उनकी क्षमता महत्वपूर्ण हो सकती है।


इसलिए चमगादड़ और वायरस के बीच संबंध को “न तुम हमें सताओ, न हम तुम्हें मारें” जैसी सरल भाषा में समझाना आकर्षक जरूर है, लेकिन वास्तविक जैविकी उससे कहीं अधिक जटिल है।


फिर वायरस चमगादड़ों में बने क्यों रहते हैं?


किसी वायरस के लिए प्राकृतिक आश्रयदाता ऐसा जीव होता है जिसमें वह लंबे समय तक बना रह सकता है और जिसकी आबादी में फैल भी सकता है।


चमगादड़ों के मामले में कई कारक एक साथ काम कर सकते हैं।


उनकी प्रजातीय विविधता बहुत अधिक है।


वे दुनिया के विशाल भौगोलिक क्षेत्रों में पाए जाते हैं।


कई प्रजातियाँ बड़ी संख्या में समूह बनाकर रहती हैं।


उनमें से अनेक लंबे समय तक जीवित रहती हैं।


वे एक-दूसरे के बहुत करीब रहती हैं और नियमित रूप से लंबी दूरी तक उड़ सकती हैं।


इन सभी परिस्थितियों से वायरस के फैलने और विभिन्न चमगादड़ आबादियों के बीच बने रहने के अवसर बढ़ सकते हैं।


लेकिन हर वायरस हर चमगादड़ में नहीं रह सकता।


वायरस और उसके मेजबान के बीच संबंध अत्यंत विशिष्ट होते हैं।


क्या चमगादड़ से हर वायरस मनुष्य तक पहुँच सकता है?


बिल्कुल नहीं।


किसी वायरस का चमगादड़ में पाया जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह मनुष्यों के लिए खतरा है।


वायरस को एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में पहुँचने के लिए कई जैविक बाधाएँ पार करनी पड़ती हैं।

उसे नए मेजबान की कोशिकाओं में प्रवेश करना होता है, वहाँ अपनी संख्या बढ़ानी होती है और फिर उस मेजबान की प्रतिरक्षा प्रणाली से बचना होता है।


इसीलिए किसी चमगादड़ में पाया गया अधिकांश वायरस मनुष्य को संक्रमित करने में सक्षम नहीं होता।


समस्या तब पैदा होती है जब कोई वायरस इन बाधाओं को पार करने में सक्षम हो जाता है।


इसे प्रजाति-पार संक्रमण या ज़ूनोटिक संक्रमण कहा जाता है।


निपाह, हेंड्रा और अन्य वायरस


चमगादड़ों और मनुष्यों के बीच वायरस के प्रसार का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण निपाह वायरस है।


फलाहारी चमगादड़ इसकी प्राकृतिक आश्रयदाता प्रजातियों में शामिल हैं। कुछ परिस्थितियों में यह वायरस चमगादड़ों से दूसरे जानवरों तक और वहाँ से मनुष्यों तक पहुँच सकता है।


हेंड्रा वायरस का संबंध भी फलाहारी चमगादड़ों से है। इसमें घोड़े मध्यवर्ती मेजबान की भूमिका निभा सकते हैं और संक्रमित घोड़ों से मनुष्यों में संक्रमण पहुँच सकता है।


मारबर्ग वायरस के लिए भी चमगादड़ों को प्राकृतिक आश्रयदाता माना जाता है।


रेबीज़ के मामले में भी कुछ चमगादड़ प्रजातियाँ महत्वपूर्ण हैं, हालांकि रेबीज़ केवल चमगादड़ों से जुड़ी बीमारी नहीं है। अनेक स्तनधारी इस वायरस को मनुष्यों तक पहुँचा सकते हैं।


इबोला के मामले में भी चमगादड़ों को संभावित प्राकृतिक आश्रयदाता माना जाता है, लेकिन इसके प्राकृतिक चक्र के बारे में वैज्ञानिक समझ अभी भी पूरी तरह पूर्ण नहीं है।


इसलिए प्रत्येक बीमारी के लिए “चमगादड़ ही स्रोत हैं” कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।


सार्स और मर्स की कहानी थोड़ी अलग है


गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम यानी सार्स पैदा करने वाला वायरस चमगादड़ों से संबंधित माना जाता है। मनुष्यों में पहुँचने से पहले सिवेट जैसे मध्यवर्ती मेजबान की भूमिका भी सामने आई थी।


मर्स के मामले में भी चमगादड़ों में पाए जाने वाले संबंधित कोरोना वायरसों की विकासवादी समानता महत्वपूर्ण है, लेकिन मनुष्यों के लिए ज्ञात प्रमुख प्राकृतिक आश्रयदाता ऊँट हैं।


ऊँट से मनुष्यों में मर्स का संक्रमण हो सकता है।


इसलिए यह कहना अधिक सही है कि इन वायरसों के विकासवादी इतिहास में चमगादड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है, जबकि मनुष्यों तक संक्रमण पहुँचाने में किसी दूसरे जानवर की भूमिका हो सकती है।


कोविड-१९ और चमगादड़


कोविड-१९ के मामले में भी सावधानी जरूरी है।


सार्स-कोव-२ का आनुवंशिक संबंध चमगादड़ों में पाए गए कुछ कोरोना वायरसों से बहुत निकट है। उदाहरण के लिए रैटजी१३ नामक चमगादड़ वायरस के साथ इसकी आनुवंशिक समानता लगभग ९६ प्रतिशत बताई गई है।


लेकिन ९६ प्रतिशत समानता का अर्थ यह नहीं है कि वही वायरस चमगादड़ से सीधे मनुष्य में आया था।

दोनों वायरसों के बीच अभी भी महत्वपूर्ण आनुवंशिक अंतर हैं।


२०२५ में विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैज्ञानिक सलाहकार समूह ने उपलब्ध प्रमाणों की समीक्षा के बाद कहा कि वर्तमान उपलब्ध साक्ष्य का भार प्राकृतिक प्रजाति-पार संक्रमण की ओर संकेत करता है, प्रत्यक्ष रूप से चमगादड़ से या किसी मध्यवर्ती मेजबान के माध्यम से। साथ ही, उपलब्ध जानकारी अधूरी होने के कारण अन्य परिकल्पनाओं को पूरी तरह खारिज करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।


इसलिए आज के वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर यह कहना उचित है कि सार्स-कोव-२ का विकासवादी संबंध चमगादड़-सम्बंधित कोरोना वायरसों से स्पष्ट है, लेकिन महामारी की शुरुआत में वायरस ने मनुष्य तक ठीक किस रास्ते से पहुँच बनाई, यह प्रश्न पूरी तरह सुलझा हुआ नहीं है।


चमगादड़ हमारे दुश्मन नहीं हैं


वायरसों से जुड़े होने के कारण चमगादड़ों को अक्सर खतरनाक जीव के रूप में देखा जाता है।

लेकिन पारिस्थितिकी की दृष्टि से चमगादड़ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।


कीटभक्षी चमगादड़ बड़ी संख्या में कीट खाते हैं। इनमें ऐसे कीट भी शामिल होते हैं जो फसलों को नुकसान पहुँचा सकते हैं।


फल खाने वाले चमगादड़ अनेक पौधों के बीज फैलाते हैं और कई वनस्पतियों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय पारिस्थितिकी तंत्रों में कई पौधों के पुनरुत्पादन के लिए उनका योगदान महत्वपूर्ण है।


अर्थात चमगादड़ केवल वायरसों के संभावित आश्रयदाता नहीं हैं।


वे पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण सदस्य हैं।


फिर मनुष्य तक वायरस पहुँचते कैसे हैं?


यहाँ सबसे महत्वपूर्ण कड़ी स्वयं चमगादड़ नहीं, बल्कि मनुष्य और वन्यजीवों के बीच बढ़ता संपर्क है।


जब जंगलों का विनाश होता है, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सिकुड़ते हैं, जंगली जीवों का शिकार और व्यापार बढ़ता है, या मनुष्य और वन्यजीव पहले की तुलना में अधिक निकट संपर्क में आते हैं, तो प्रजाति-पार संक्रमण के अवसर बढ़ सकते हैं।


जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग में बदलाव भी कई प्रजातियों के वितरण तथा उनके व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।


इसका अर्थ यह नहीं है कि हर जंगल कटने के बाद कोई महामारी अवश्य होगी।


लेकिन जितने अधिक अवसर मनुष्य और वन्यजीवों के बीच असामान्य और निकट संपर्क के पैदा होंगे, उतने ही अधिक अवसर किसी वायरस के प्रजाति की सीमा पार करने के भी हो सकते हैं।


असली कहानी चमगादड़ नहीं, संतुलन की है


चमगादड़ों को केवल “वायरस का घर” कहना उनकी जैविक विशेषता को बहुत छोटा कर देना होगा।

वे ऐसे जीव हैं जिन्होंने उड़ान, अत्यधिक ऊर्जा खपत, लंबी आयु, विविध आवास और असाधारण प्रतिरक्षा-संतुलन के साथ विकास किया है।


उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली वायरसों के खिलाफ सुरक्षा देती है, लेकिन साथ ही अत्यधिक सूजन और ऊतक क्षति को नियंत्रित करने की क्षमता भी रखती है।


यही कारण हो सकता है कि कुछ वायरस उनके भीतर अपेक्षाकृत कम बीमारी पैदा करते हुए लंबे समय तक बने रह सकें।


लेकिन किसी वायरस का चमगादड़ में होना और उसका मनुष्य के लिए महामारी बन जाना दो अलग-अलग घटनाएँ हैं।


इसलिए अगली बार जब किसी नए वायरस के साथ चमगादड़ का नाम सुनाई दे, तो चमगादड़ को दोषी ठहराने से पहले यह समझना जरूरी है कि प्रकृति में वायरस, वन्यजीव और मनुष्य के बीच संबंध कितना जटिल है।


चमगादड़ वायरसों के निर्माता नहीं हैं। वे प्रकृति के एक ऐसे हिस्से हैं जहाँ वायरस और मेजबान ने करोड़ों वर्षों में एक जटिल संतुलन विकसित किया है।


और जब यह संतुलन मनुष्य की गतिविधियों के कारण टूटता है, तब किसी वायरस के लिए एक नई प्रजाति तक पहुँचने का रास्ता खुल सकता है।


शायद इसलिए भविष्य की महामारियों से बचने का रास्ता केवल नए वायरस की खोज करना नहीं, बल्कि वन्यजीवों, उनके आवास और मनुष्य के बीच बदलते संबंधों को समझना भी है।


—मूल आलेख एवं विषय-विचार: धर्मेंद्र कुमार

पुनर्लेखन, तथ्य-जाँच एवं संपादकीय प्रस्तुति: आखरवाणी संपादकीय


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