जुड़वाँ बच्चे कैसे होते हैं? एक जैसे और अलग जुड़वाँ बनने का विज्ञान
एक गर्भ से दो बच्चे कैसे? जुड़वाँ बच्चों के जन्म का विज्ञान
प्रकृति में एक संतान का जन्म सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन कभी-कभी गर्भ में एक साथ दो या उससे अधिक भ्रूण विकसित होने लगते हैं। यही कारण है कि दुनिया में जुड़वाँ, तीन जुड़वाँ और कभी-कभी इससे भी अधिक बच्चों का जन्म होता है।
लेकिन आखिर एक गर्भ में दो बच्चे बनते कैसे हैं?
क्या एक ही अंडाणु से दो बच्चे बन सकते हैं?
क्या जुड़वाँ बच्चे हमेशा एक जैसे दिखाई देते हैं?
और क्या हर जुड़वाँ बच्चे का आनुवंशिक आधार एक जैसा होता है?
इन सवालों का उत्तर समझने के लिए पहले सामान्य मानव प्रजनन को समझना होगा।
एक बच्चे के बनने की शुरुआत कहाँ से होती है?
मानव में लैंगिक प्रजनन होता है। पुरुष के वृषणों में शुक्राणु बनते हैं और स्त्री के अंडाशयों में अंडाणु परिपक्व होते हैं।
निषेचन के समय एक शुक्राणु और एक अंडाणु मिलते हैं। इनके मिलने से एक नई कोशिका बनती है, जिसे युग्मनज या जाइगोट कहा जाता है।
यही एक कोशिका लगातार विभाजित होती जाती है।
एक कोशिका से दो, दो से चार, चार से आठ और फिर लगातार अधिक कोशिकाएँ बनती जाती हैं। इस क्रमिक विभाजन और विकास से भ्रूण का निर्माण होता है।
भ्रूण गर्भाशय में स्थापित होता है और आगे चलकर उसका विकास होता रहता है। गर्भावस्था के दौरान एक निश्चित चरण के बाद विकसित हो रहे शिशु को भ्रूण कहा जाता है और सामान्य गर्भावस्था लगभग ४० सप्ताह तक चलती है।
लेकिन कभी-कभी इस प्रक्रिया में एक ही निषेचित अंडाणु से दो अलग भ्रूण बनने लगते हैं।
यहीं से शुरू होती है एक जैसे जुड़वाँ बच्चों की कहानी।
एक जैसे जुड़वाँ बच्चे कैसे बनते हैं?
मान लीजिए एक अंडाणु का निषेचन एक शुक्राणु से हुआ और एक युग्मनज बना।
आमतौर पर यही युग्मनज आगे विभाजित होकर एक भ्रूण बनाता है।
लेकिन कुछ मामलों में भ्रूण के विकास के शुरुआती चरण में यही एक निषेचित अंडाणु दो अलग भ्रूणों में विभाजित हो जाता है।
अब दोनों भ्रूणों की शुरुआत एक ही अंडाणु और एक ही शुक्राणु से हुई है।
ऐसे जुड़वाँ बच्चों को समयुग्मजी या एक जैसे जुड़वाँ कहा जाता है।
अंग्रेज़ी में इन्हें मोनोजाइगोटिक ट्विन्स कहा जाता है।
चूँकि दोनों की शुरुआत एक ही युग्मनज से हुई है, इसलिए उनका आनुवंशिक पदार्थ बहुत हद तक समान होता है और वे आम तौर पर एक ही जैविक लिंग के होते हैं।
इसी कारण ऐसे जुड़वाँ बच्चे अक्सर चेहरे, बालों, आँखों और शरीर की बनावट में एक-दूसरे से बहुत मिलते-जुलते दिखाई देते हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे हर मायने में बिल्कुल एक जैसे होंगे।
उदाहरण के लिए, एक जैसे जुड़वाँ बच्चों की उँगलियों के निशान भी एक-दूसरे से अलग होते हैं। उनके विकास पर गर्भ के भीतर की परिस्थितियों और जन्म के बाद के वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है।
क्या एक युग्मनज चार बच्चों में भी बदल सकता है?
सैद्धांतिक रूप से एक प्रारंभिक भ्रूण के विभाजन से एक से अधिक समान भ्रूण बन सकते हैं। इसी तरह कुछ मामलों में तीन या उससे अधिक एक जैसे जुड़वाँ भी जन्म ले सकते हैं।
लेकिन यह अत्यंत दुर्लभ है।
इसलिए यह कहना कि युग्मनज चार कोशिकाओं में टूट गया और इसलिए चार हमशक्ल बच्चे पैदा हो गए, सही वैज्ञानिक व्याख्या नहीं है।
भ्रूण का विकास केवल सामान्य कोशिका-विभाजन की तरह किसी निश्चित चरण पर चार बराबर टुकड़ों में टूट जाने की प्रक्रिया नहीं है। यह एक जटिल जैविक विकासक्रम है।
फिर अलग-अलग दिखने वाले जुड़वाँ कैसे बनते हैं?
अब दूसरी स्थिति समझिए।
कभी-कभी स्त्री के एक मासिक चक्र में एक से अधिक अंडाणु निकल सकते हैं।
यदि उसी अवधि में दो अलग-अलग अंडाणुओं का निषेचन दो अलग-अलग शुक्राणुओं से हो जाए, तो दो अलग-अलग युग्मनज बनेंगे।
दोनों युग्मनज स्वतंत्र रूप से भ्रूण के रूप में विकसित होंगे।
इस तरह पैदा होने वाले जुड़वाँ बच्चों को द्वियुग्मजी या भ्रातृ जुड़वाँ कहा जाता है।
अंग्रेज़ी में इन्हें डाइज़ाइगोटिक या फ्रैटरनल ट्विन्स कहा जाता है।
इन दोनों बच्चों का आनुवंशिक संबंध वैसा ही होता है जैसा सामान्य भाई-बहनों का होता है—बस दोनों का जन्म एक ही गर्भावस्था में हुआ होता है।
इसलिए दोनों का चेहरा अलग हो सकता है, कद-काठी अलग हो सकती है और उनकी शारीरिक विशेषताएँ भी अलग हो सकती हैं।
वे एक ही जैविक लिंग के भी हो सकते हैं और अलग-अलग जैविक लिंग के भी।
यानी एक लड़का और एक लड़की भी जुड़वाँ हो सकते हैं।
क्या जुड़वाँ बच्चे हमेशा एक ही लिंग के होते हैं?
नहीं।
यदि जुड़वाँ बच्चे एक ही युग्मनज से बने हैं, तो सामान्यतः उनका आनुवंशिक लिंग समान होता है।
लेकिन यदि दो अलग-अलग अंडाणुओं का दो अलग-अलग शुक्राणुओं से निषेचन हुआ है, तो एक बच्चा लड़का और दूसरा लड़की हो सकता है।
इसलिए केवल यह देखकर कि दो बच्चे जुड़वाँ हैं, यह नहीं कहा जा सकता कि वे एक जैसे दिखेंगे या उनका जैविक लिंग समान होगा।
एक जैसे जुड़वाँ भी बिल्कुल समान क्यों नहीं होते?
यह एक दिलचस्प बात है।
एक जैसे जुड़वाँ बच्चों का आनुवंशिक पदार्थ लगभग समान होता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि जन्म से लेकर जीवनभर उनके शरीर की हर विशेषता बिल्कुल समान रहेगी।
भ्रूण के विकास के दौरान छोटे-छोटे जैविक अंतर पैदा हो सकते हैं। गर्भ में पोषण, रक्त प्रवाह और अन्य विकासात्मक परिस्थितियाँ भी दोनों बच्चों को अलग-अलग प्रभावित कर सकती हैं।
जन्म के बाद वातावरण, भोजन, जीवनशैली, बीमारियाँ और अनुभव भी उनके शरीर और व्यवहार पर प्रभाव डालते हैं।
इसीलिए एक जैसे जुड़वाँ बच्चों के चेहरे भले ही बहुत मिलते-जुलते हों, लेकिन उनकी आवाज, व्यक्तित्व, पसंद, आदतें और कई शारीरिक विशेषताएँ अलग हो सकती हैं।
क्या जुड़वाँ बच्चों के डीएनए बिल्कुल समान होते हैं?
एक जैसे जुड़वाँ बच्चों का डीएनए बहुत हद तक समान होता है, लेकिन “पूरी तरह हर स्तर पर एक जैसा” कहना उचित नहीं है।
समय के साथ कोशिकाओं में छोटे आनुवंशिक परिवर्तन हो सकते हैं। इसके अलावा जीन की सक्रियता को प्रभावित करने वाली जैविक प्रक्रियाएँ भी दोनों व्यक्तियों में अलग हो सकती हैं।
इसी कारण विज्ञान में एक जैसे जुड़वाँ बच्चों का अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
वैज्ञानिक उनके बीच समानताओं और अंतर का अध्ययन करके यह समझने की कोशिश करते हैं कि किसी विशेष गुण पर जीन का कितना प्रभाव है और वातावरण का कितना।
जुड़वाँ होने की संभावना किन बातों से बढ़ सकती है?
दो अलग-अलग अंडाणुओं के निषेचन से बनने वाले जुड़वाँ बच्चों की संभावना कई कारकों से प्रभावित हो सकती है।
परिवार में भ्रातृ जुड़वाँ बच्चों का इतिहास एक कारक हो सकता है। महिला की उम्र, पहले से बच्चों की संख्या, कुछ आनुवंशिक प्रवृत्तियाँ और प्रजनन उपचार भी जुड़वाँ गर्भावस्था की संभावना को प्रभावित कर सकते हैं।
विशेष रूप से ऐसी प्रजनन तकनीकें जिनमें एक से अधिक अंडाणु परिपक्व हो सकते हैं या एक से अधिक भ्रूण गर्भाशय में स्थानांतरित किए जाते हैं, जुड़वाँ या उससे अधिक बच्चों वाली गर्भावस्था की संभावना बढ़ा सकती हैं।
इसके विपरीत, एक जैसे जुड़वाँ बनने का कारण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अधिकांश मामलों में यह पता नहीं होता कि एक शुरुआती भ्रूण दो भ्रूणों में क्यों विभाजित हो गया।
और जो बच्चे शरीर से जुड़े हुए पैदा होते हैं?
कभी-कभी एक जैसे जुड़वाँ भ्रूणों का विभाजन पूरी तरह नहीं हो पाता।
ऐसी स्थिति में दोनों भ्रूणों के शरीर के कुछ हिस्से आपस में जुड़े रह सकते हैं।
इन्हें संयुक्त जुड़वाँ कहा जाता है।
इनका जुड़ाव शरीर के अलग-अलग हिस्सों में हो सकता है। कुछ बच्चे छाती या पेट के पास जुड़े हो सकते हैं, जबकि कुछ दुर्लभ मामलों में सिर या शरीर के अन्य हिस्सों पर जुड़ाव हो सकता है।
कई बार दोनों बच्चे कुछ अंग भी साझा कर सकते हैं।
यह अत्यंत दुर्लभ स्थिति है और इसका संबंध भ्रूण के शुरुआती विकास में एक जैसे जुड़वाँ भ्रूणों के पूर्ण रूप से अलग न हो पाने से माना जाता है।
यह कहना सही नहीं है कि अगर दो भ्रूणों के सिर बनाने वाली कोशिकाएँ अलग नहीं हुईं तो वे निश्चित रूप से सिर से जुड़े बच्चे बनेंगे या पीठ बनाने वाली कोशिकाओं के कारण पीठ से जुड़ेंगे। भ्रूण का विकास इतना सरल विभाजन-आधारित नहीं है।
संयुक्त जुड़वाँ का शरीर किस प्रकार जुड़ा होगा, यह भ्रूण के विकास के दौरान होने वाली जटिल प्रक्रियाओं पर निर्भर करता है।
एक ही गर्भ में दो जीवन
जुड़वाँ बच्चों का जन्म हमें यह समझने का एक अद्भुत अवसर देता है कि मानव शरीर का निर्माण कितनी जटिल प्रक्रिया है।
एक ही अंडाणु और एक ही शुक्राणु से बने दो बच्चे लगभग समान आनुवंशिक आधार साझा कर सकते हैं, फिर भी वे दो अलग व्यक्ति बनते हैं।
दूसरी ओर, दो अलग अंडाणु और दो अलग शुक्राणु मिलकर ऐसे जुड़वाँ बच्चे पैदा कर सकते हैं जिनमें आनुवंशिक समानता सामान्य भाई-बहनों जैसी हो।
अर्थात जुड़वाँ होना केवल एक गर्भ में दो बच्चों के होने की घटना नहीं है। इसके पीछे निषेचन, भ्रूण-विभाजन, आनुवंशिकी और गर्भ में होने वाले विकास की बेहद जटिल प्रक्रियाएँ काम करती हैं।
और शायद यही इस पूरी प्रक्रिया की सबसे खूबसूरत बात है—
दो बच्चे एक ही गर्भ में एक ही समय पर विकसित हो सकते हैं, लेकिन जन्म के बाद वे दो बिल्कुल अलग व्यक्तित्व बनकर अपनी-अपनी दुनिया रचते हैं।
मूल आलेख एवं विषय-विचार: धर्मेंद्र कुमार
पुनर्लेखन, तथ्य-जाँच एवं संपादकीय प्रस्तुति: आखरवाणी संपादकीय

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