Ashfaq Ahmad
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वायेजर अभियान: मानवता की सबसे लंबी अंतरिक्ष यात्रा और ब्रह्मांड की खोज

 


वायेजर: जब इंसान ने अपना संदेश तारों के पार भेज दिया


खोज करना मनुष्य की फितरत है। वह हमेशा अपने आसपास की दुनिया को समझने की कोशिश करता रहा है और जब धरती की सीमाएँ छोटी पड़ गईं तो उसकी नजर आसमान की ओर उठ गई।


लेकिन आकाश भी आखिर कहाँ समाप्त होता है?

ब्रह्मांड कितना बड़ा है?

इसमें कितनी आकाशगंगाएँ हैं?

कितने तारे हैं?

कितने ग्रह और कितने उपग्रह हैं?

इनमें से कई प्रश्नों के उत्तर आज भी हमारे पास नहीं हैं। ब्रह्मांड का बड़ा हिस्सा अभी हमारी जानकारी और हमारी पहुँच से बाहर है। फिर भी मनुष्य ने उसकी ओर अपने छोटे-छोटे दूत भेजने शुरू कर दिए हैं।

इनमें सबसे प्रसिद्ध नाम है—वायेजर।

१९७७ में अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने दो अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष में भेजे। वायेजर २ को २० अगस्त १९७७ को केप कैनावेरल से प्रक्षेपित किया गया और उसके बाद ५ सितंबर १९७७ को वायेजर १ रवाना हुआ।

इन दोनों यानों को मूल रूप से बृहस्पति और शनि का अध्ययन करने के लिए बनाया गया था। लेकिन अंतरिक्ष की परिस्थितियों, वैज्ञानिक सफलता और उनकी असाधारण क्षमता ने इस अभियान को बहुत आगे पहुँचा दिया।

आज लगभग पाँच दशक बाद भी दोनों वायेजर अंतरिक्ष में सक्रिय हैं।

वायेजर की यात्रा इतनी असाधारण क्यों है?

वायेजर १ और वायेजर २ ने हमारे सौरमंडल के चारों विशाल ग्रहों—बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण—का अध्ययन किया।

वायेजर २ एकमात्र ऐसा अंतरिक्ष यान है जिसने इन चारों ग्रहों के पास से उड़ान भरी है।

वायेजर १ ने बृहस्पति और शनि का अध्ययन किया और बाद में सौरमंडल की बाहरी सीमा की ओर बढ़ गया। २०१२ में वह सूर्य के प्रभाव वाले क्षेत्र की बाहरी सीमा, जिसे हेलियोपॉज़ कहा जाता है, पार करके अंतरतारकीय अंतरिक्ष में पहुँच गया।

वायेजर २ ने २०१८ में यह सीमा पार की।

इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों यान पूरी तरह सौरमंडल से बाहर निकल चुके हैं। वे अभी भी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव वाले विशाल क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन उन्होंने सूर्य के उस क्षेत्र को पार कर लिया है जिसे हम हेलियोस्फियर कहते हैं और अब वे अंतरतारकीय माध्यम का अध्ययन कर रहे हैं।

बृहस्पति ने खोले कई रहस्य


वायेजर अभियान की शुरुआत में ही वैज्ञानिकों को ऐसी जानकारियाँ मिलने लगीं, जिन्होंने ग्रहों के बारे में हमारी समझ बदल दी।

१९७९ में वायेजर १ और वायेजर २ ने बृहस्पति के पास से उड़ान भरी।

उन्होंने बृहस्पति के वायुमंडल, चुंबकीय क्षेत्र, वलयों और उसके उपग्रहों का विस्तृत अध्ययन किया। वायेजर यानों से प्राप्त तस्वीरों और वैज्ञानिक आँकड़ों ने बृहस्पति को केवल आकाश में दिखाई देने वाली एक चमकीली वस्तु से कहीं अधिक जटिल दुनिया के रूप में सामने रखा।

सबसे रोमांचक खोजों में से एक बृहस्पति के उपग्रह आयो पर सक्रिय ज्वालामुखियों की थी।

यह पहली बार था जब वैज्ञानिकों ने सौरमंडल में पृथ्वी के अलावा किसी अन्य खगोलीय पिंड पर सक्रिय ज्वालामुखीय गतिविधि देखी।

शनि से अरुण और वरुण तक


वायेजर १ ने १९८० में शनि के पास से उड़ान भरी। इसके बाद उसका मार्ग उसे सौरमंडल के तल से दूर अंतरिक्ष की ओर ले गया।

वायेजर २ की यात्रा अलग थी।

शनि के बाद उसने अरुण की ओर यात्रा जारी रखी और जनवरी १९८६ में अरुण के पास से गुजरा। इसके बाद अगस्त १९८९ में वह वरुण तक पहुँचा।

इस तरह वायेजर २ मानव इतिहास का पहला और अब तक का एकमात्र अंतरिक्ष यान बन गया जिसने अरुण और वरुण दोनों के पास से उड़ान भरी।

इन यात्राओं के दौरान वैज्ञानिकों को इन ग्रहों के वायुमंडल, चुंबकीय क्षेत्रों, वलयों और उपग्रहों के बारे में ऐसी जानकारी मिली जो धरती से केवल दूरबीनों के माध्यम से प्राप्त करना संभव नहीं था।

वायेजर अभियान ने कुल मिलाकर बाहरी सौरमंडल के चारों विशाल ग्रहों और उनके ४८ उपग्रहों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई।

इतनी दूर से संदेश कैसे आते हैं?


यह कल्पना करना ही कठिन है कि लगभग पाँच दशक पुराना एक अंतरिक्ष यान अरबों किलोमीटर दूर से आज भी धरती तक अपना संदेश भेज रहा है।

वायेजर यानों से आने वाले रेडियो संकेत प्रकाश की गति से यात्रा करते हैं। लेकिन दूरी इतनी विशाल है कि संकेतों को धरती तक पहुँचने में कई घंटे लगते हैं।

वायेजर १ से भेजा गया कोई संकेत धरती तक पहुँचने में लगभग एक दिन का समय लेता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक इन यानों को वास्तविक समय में नियंत्रित नहीं कर सकते। धरती से भेजे गए आदेश भी वहाँ पहुँचने में घंटों लेते हैं और फिर अंतरिक्ष यान की प्रतिक्रिया वापस आने में उतना ही समय लगता है।

इन संकेतों को पकड़ने के लिए नासा का डीप स्पेस नेटवर्क काम करता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में स्थित विशाल रेडियो एंटेनाओं की सहायता से वायेजर जैसे दूरस्थ अंतरिक्ष यानों से आने वाले अत्यंत कमजोर संकेतों को ग्रहण किया जाता है।

धरती से इतनी दूर एक छोटे से यान की आवाज सुनना अपने आप में मानव इंजीनियरिंग की असाधारण उपलब्धि है।

फिर भी ये यान चलते कैसे हैं?


वायेजर यानों में सामान्य सौर पैनल नहीं हैं। इतनी दूर सूर्य की रोशनी इतनी कमजोर हो जाती है कि वहाँ सौर ऊर्जा से पर्याप्त बिजली पैदा करना व्यावहारिक नहीं होता।

इसलिए दोनों यानों में रेडियोआइसोटोप तापविद्युत जनित्र लगाए गए हैं।

इनमें रेडियोधर्मी पदार्थ के क्षय से पैदा होने वाली ऊष्मा को विद्युत ऊर्जा में बदला जाता है।

लेकिन यह ऊर्जा हमेशा एक जैसी नहीं रहती।

समय के साथ रेडियोधर्मी पदार्थ का क्षय होता रहता है और यानों द्वारा उपलब्ध कराई जा सकने वाली विद्युत शक्ति घटती जाती है। इसलिए नासा के इंजीनियरों को लगातार यह तय करना पड़ रहा है कि कौन-से उपकरण बंद किए जाएँ और कौन-से वैज्ञानिक उपकरण चालू रखे जाएँ।

२०२५ और २०२६ में भी दोनों वायेजर यानों के कुछ वैज्ञानिक उपकरण ऊर्जा बचाने के लिए बंद किए गए हैं। इसके बावजूद २०२६ में दोनों यान अब भी काम कर रहे हैं और अंतरतारकीय अंतरिक्ष से वैज्ञानिक आँकड़े भेज रहे हैं।

वायेजर २ के मामले में इंजीनियरों ने २०२६ में ऊर्जा प्रबंधन की नई तकनीकों के माध्यम से उसके वैज्ञानिक अभियान को अपेक्षा से अधिक समय तक जारी रखने की व्यवस्था भी की है।

यानी मूल लेख में जिस तरह यह कहा गया था कि “अगले दस वर्षों में दोनों पूरी तरह बंद हो जाएँगे”, उसे आज निश्चित समय-सीमा की तरह कहना उचित नहीं है। ऊर्जा लगातार घट रही है, लेकिन नासा आवश्यकता के अनुसार उपकरण बंद करके इन दोनों यानों की वैज्ञानिक आयु बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

वायेजर के साथ एक संदेश भी जा रहा है


वायेजर अभियान की सबसे भावुक और प्रसिद्ध विशेषताओं में से एक है—गोल्डन रिकॉर्ड।

दोनों यानों पर सोने की परत चढ़ी एक विशेष अभिलेख-पट्टिका रखी गई है। इसमें पृथ्वी और मानव सभ्यता से संबंधित चित्र, वैज्ञानिक संकेत, विभिन्न भाषाओं में अभिवादन, प्राकृतिक ध्वनियाँ और संगीत शामिल हैं।

इसे एक तरह से अंतरिक्ष में भेजी गई मानवता की बोतल में बंद चिट्ठी कहा जा सकता है।

यदि कभी किसी दूसरी सभ्यता का कोई बुद्धिमान प्राणी इन यानों तक पहुँचता है और वह इस अभिलेख को समझने में सक्षम होता है, तो उसे पृथ्वी नामक एक छोटे से ग्रह और उस पर रहने वाली मानव सभ्यता के बारे में कुछ जानकारी मिल सकती है।

यह रिकॉर्ड किसी निश्चित एलियन सभ्यता तक संदेश पहुँचाने के लिए नहीं बनाया गया था। यह अधिक व्यापक अर्थ में मानवता का एक संदेश है—हम कौन हैं, हमारी दुनिया कैसी है और हम ब्रह्मांड में कहाँ से आए हैं।

क्या वायेजर हमेशा चलता रहेगा?


नहीं।

एक समय आएगा जब इन यानों के पास वैज्ञानिक उपकरणों और संचार प्रणाली को चलाने के लिए पर्याप्त ऊर्जा नहीं बचेगी। तब वे धरती को कोई नया वैज्ञानिक संदेश भेजने में सक्षम नहीं होंगे।

लेकिन उनका सफर वहीं समाप्त नहीं होगा।

वे अंतरिक्ष में आगे बढ़ते रहेंगे।

उनकी मशीनें काम करना बंद कर देंगी, रेडियो संकेत मौन हो जाएँगे और धरती से उनका संपर्क हमेशा के लिए टूट जाएगा। लेकिन दोनों यान अपने रास्ते पर चलते रहेंगे।

और उनके साथ मानवता का वह छोटा-सा संदेश भी चलता रहेगा जो गोल्डन रिकॉर्ड में सुरक्षित है।

वायेजर ने हमें क्या दिया?

वायेजर अभियान ने केवल ग्रहों की तस्वीरें नहीं भेजीं।

इसने हमें यह समझने में मदद की कि हमारा सौरमंडल कितना जटिल है। बृहस्पति के सक्रिय ज्वालामुखीय उपग्रह से लेकर शनि के वलयों तक, अरुण की विचित्र दुनिया से लेकर वरुण के तूफानी वातावरण तक—वायेजर ने हमारी सौरमंडलीय समझ को कई स्तरों पर बदल दिया।

और फिर इन यानों ने मानव खोज को ग्रहों की सीमाओं से भी आगे पहुँचा दिया।

आज वायेजर १ और वायेजर २ अंतरतारकीय अंतरिक्ष में हैं। वे उन परिस्थितियों का अध्ययन कर रहे हैं जिनके बारे में मनुष्य ने कभी केवल कल्पना की थी।

करीब पाँच दशक पहले पृथ्वी से छोड़े गए ये दोनों यान आज भी उस दुनिया की खबर ला रहे हैं, जहाँ इससे पहले कोई मानव निर्मित यान नहीं पहुँचा था।

एक दिन इनके रेडियो संकेत हमेशा के लिए बंद हो जाएँगे।

लेकिन शायद वायेजर की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके बाद भी जीवित रहेगी।

क्योंकि अंतरिक्ष में तैरता हुआ वह छोटा-सा यान केवल धातु, तारों और उपकरणों का ढाँचा नहीं है।

उसमें एक संदेश है।

एक ग्रह की आवाज़ है।

एक सभ्यता की पहचान है।

और शायद किसी अज्ञात भविष्य के लिए मनुष्य की यह घोषणा भी—

हमने अपने छोटे से ग्रह से बाहर निकलकर ब्रह्मांड की ओर देखना शुरू कर दिया था।


—मूल आलेख एवं विषय-विचार: धर्मेंद्र कुमार

पुनर्लेखन, तथ्य-जाँच एवं संपादकीय प्रस्तुति: आखरवाणी संपादकीय



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