Ashfaq Ahmad
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मिहिरभोज: गुर्जर-प्रतिहार सम्राट, साम्राज्य विस्तार और अरब आक्रमणों का प्रतिरोध

 


मिहिरभोज का युग: जब गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य ने उत्तर भारत की शक्ति-संरचना बदल दी

मिहिरभोज और उनके युग का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य


इन दिनों सम्राट मिहिरभोज का जन्मदिवस मनाए जाने की चर्चा होती है, लेकिन उनके जन्म की किसी निश्चित तिथि के समर्थन में स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए किसी एक निर्धारित तिथि को उनका प्रमाणित जन्मदिवस मानना इतिहास की दृष्टि से सावधानी की अपेक्षा रखता है।

हालाँकि, इस बात में संदेह की कोई विशेष गुंजाइश नहीं कि गुर्जर-प्रतिहार शासक मिहिरभोज नौवीं शताब्दी के उत्तर भारत के अत्यंत शक्तिशाली सम्राटों में थे। उनके शासनकाल में गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य का विस्तार इतना व्यापक हुआ कि वह उत्तर भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों में स्थापित हो गया।

गुर्जर-प्रतिहारों की उत्पत्ति को लेकर इतिहास में लंबे समय से मतभेद रहे हैं। उनके अभिलेखों में स्वयं को रघुकुलवंशी क्षत्रिय बताया गया है और राम के भाई लक्ष्मण से अपना संबंध जोड़ा गया है। दूसरी ओर, घटियाला अभिलेख में गुर्जर-प्रतिहारों के मूल पुरुष हरिश्चंद्र को ब्राह्मण तथा उनकी क्षत्रिय पत्नी भद्रा से उत्पन्न बताया गया है। कुछ इतिहासकारों ने गुर्जरों को शक, सीथियन, हूण अथवा खजर जैसे बाहरी समूहों से जोड़ने का प्रयास किया है, जबकि अनेक विद्वान उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप के ही किसी स्थानीय राजनीतिक अथवा जनजातीय समूह से विकसित मानते हैं।

उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इतना निश्चित रूप से कहना कठिन है कि गुर्जर-प्रतिहार किसी एक आधुनिक अर्थ में निर्धारित जाति या वर्ण से संबंधित थे अथवा उनका मूल पूर्णतः देशी या विदेशी था। इस विषय में अलग-अलग स्रोतों और ऐतिहासिक व्याख्याओं के बीच पर्याप्त मतभेद हैं। इसलिए उनके मूल को लेकर किसी एक मत को निर्विवाद ऐतिहासिक सत्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

गुर्जर-प्रतिहारों का उदय और अरब आक्रमण


प्राचीन भारतीय इतिहास में विक्रमादित्य और भोज जैसे नाम केवल राजाओं के नाम नहीं रहे, बल्कि कालांतर में लोकस्मृति और साहित्य में लोकप्रिय राजकीय आदर्शों के प्रतीक बन गए। मिहिरभोज भी इसी व्यापक ऐतिहासिक परंपरा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाम हैं।

गुर्जर-प्रतिहार शक्ति का उदय आठवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण में उस समय हुआ, जब पश्चिम से आने वाले अरब आक्रमणकारी भारतीय भूभाग में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे। प्रतिहार वंश के प्रथम प्रमुख शासक नागभट्ट प्रथम के अरबों के विरुद्ध संघर्ष का उल्लेख बाद के मिहिरभोजकालीन ग्वालियर अभिलेख में मिलता है।

ग्वालियर प्रशस्ति में नागभट्ट को म्लेच्छाधिप की विशाल सेनाओं को परास्त करने वाला शासक बताया गया है। इतिहासकार सामान्यतः इस उल्लेख को उस दौर में सिंध, गुजरात, काठियावाड़, राजस्थान और मालवा की ओर बढ़ रही अरब शक्ति के संदर्भ में देखते हैं।

अरब लेखक अल-बिलादुरी के विवरण भी इस संघर्ष के व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ को समझने में उपयोगी हैं। उसके अनुसार अरब सेनाओं ने भारत के कई क्षेत्रों में अभियान किए, लेकिन उज्जैन की दिशा में उनके अभियान स्थायी विजय में परिवर्तित नहीं हो सके। इससे यह संकेत मिलता है कि पश्चिमी भारत और मालवा के क्षेत्रों में अरब विस्तार को स्थानीय शक्तियों के गंभीर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।

ग्वालियर प्रशस्ति नागभट्ट प्रथम की इस भूमिका को अत्यंत प्रभावशाली रूपक के माध्यम से प्रस्तुत करती है। उसमें उन्हें ऐसा शासक बताया गया है जिसने म्लेच्छ शासक की विशाल सेना को नष्ट किया और मानो नारायण के रूप में प्रकट होकर लोगों की रक्षा की।

इस संदर्भ में ईस्वी सन् ७३८ के नौसारी अभिलेख का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। इसमें अरबों से संबंधित ताजिक शक्ति द्वारा सिंध, सौराष्ट्र, चावोटक, मौर्य और गुर्जर क्षेत्रों पर किए गए अभियानों का उल्लेख मिलता है, लेकिन उज्जैन और मालवा पर स्थायी विजय का उल्लेख नहीं मिलता। इससे अरब विस्तार के विरुद्ध स्थानीय प्रतिरोध की ऐतिहासिक तस्वीर और स्पष्ट होती है।

नागभट्ट प्रथम की सफलता केवल किसी एक युद्ध तक सीमित नहीं रही। अरब सेनाओं को पीछे हटना पड़ा और भारतीय भूभाग के भीतर उनका विस्तार लंबे समय तक उसी गति से आगे नहीं बढ़ सका। बाद के अरब विवरणों में भी भारत में अरब शक्ति के पीछे हटने का संकेत मिलता है।

नागभट्ट से मिहिरभोज तक


नागभट्ट प्रथम के बाद प्रतिहार शक्ति को आगे बढ़ाने का कार्य नागभट्ट द्वितीय ने किया। उसने उज्जैन के स्थान पर कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया और प्रतिहार शक्ति को उत्तर भारत की राजनीति के केंद्र में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए।

नागभट्ट द्वितीय के बाद उसके पुत्र रामभद्र का शासन अपेक्षाकृत अल्पकालिक रहा। रामभद्र और रानी अप्पादेवी के पुत्र मिहिरभोज ने आगे चलकर प्रतिहार साम्राज्य को पुनः सुदृढ़ किया। उनके अभिलेखों और सिक्कों में प्रभास तथा आदिवराह जैसी उपाधियाँ मिलती हैं।

मिहिरभोज के राजनीतिक प्रभाव का आकलन केवल प्रशस्तियों के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनके समय और उनके बाद के अभिलेखों के साथ-साथ कल्हण की राजतरंगिणी और अरब व्यापारी सुलेमान के विवरण भी उनके शासन की व्यापकता और सैन्य शक्ति के बारे में महत्वपूर्ण संकेत देते हैं।

मिहिरभोज का प्रारंभिक उपलब्ध अभिलेख विक्रम संवत् ८९३ अर्थात् ईस्वी सन् ८३६ का माना जाता है। इससे उनके शासन के प्रशासनिक संगठन और साम्राज्य की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में जानकारी मिलती है। उपलब्ध साक्ष्यों से यह संकेत मिलता है कि उन्होंने अपने दादा नागभट्ट द्वितीय के समय स्थापित साम्राज्य को पुनर्गठित किया, जो उनके पिता रामभद्र के समय कुछ कमजोर पड़ गया था।


हिमालय से बंगाल तक फैला प्रभाव


मिहिरभोज की शक्ति का विस्तार उनके समकालीन सामंतों और विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त अभिलेखों में दिखाई देता है। ग्वालियर प्रशस्ति में उनके सैन्य विस्तार की तुलना अगस्त्य ऋषि द्वारा विंध्य पर्वत की वृद्धि रोकने से की गई है। यह अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशस्ति-भाषा होने के बावजूद उनके व्यापक राजनीतिक प्रभाव का महत्वपूर्ण संकेत देती है।

अभिलेखीय प्रमाणों के आधार पर मिहिरभोज के प्रभाव का विस्तार हिमालय की तराई से लेकर विंध्य क्षेत्र, गुजरात, राजस्थान और बंगाल तक माना जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कहला अभिलेख में उनका सामना पाल शासक देवपाल और उसके उत्तराधिकारियों से होने का संकेत मिलता है। इसमें भोज द्वारा गौड़राज की लक्ष्मी का हरण किए जाने का उल्लेख है, जहाँ गौड़ से आशय बंगाल क्षेत्र से है।

पूर्वी पंजाब के पेहवा अभिलेख से भी मिहिरभोज के शासन और उसके प्रभाव की जानकारी मिलती है। इस अभिलेख की विशेषता केवल उसकी राजनीतिक सूचना नहीं है, बल्कि इसमें घोड़ों के व्यापारियों, मंदिरों को दिए जाने वाले धन और व्यापार पर लगाए जाने वाले करों से संबंधित व्यवस्था का भी उल्लेख मिलता है। इससे उस समय के व्यापारिक और प्रशासनिक जीवन की एक महत्वपूर्ण झलक मिलती है।

दिल्ली के पुराने किले के निकट प्राप्त एक खंडित अभिलेख से भी इस क्षेत्र पर प्रतिहार प्रभाव का संकेत मिलता है। इस प्रकार विभिन्न स्थानों से प्राप्त अभिलेख मिहिरभोज के व्यापक राजनीतिक प्रभाव की अलग-अलग कड़ियाँ जोड़ते हैं।

राष्ट्रकूटों और पालों से संघर्ष


मिहिरभोज का संघर्ष केवल पश्चिम से आने वाली अरब शक्ति तक सीमित नहीं था। दक्षिण में राष्ट्रकूट और पूर्व में पाल उनके प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी थे।

राष्ट्रकूटों के साथ उनका संघर्ष कई चरणों में हुआ, जिसमें दोनों पक्षों को अलग-अलग अवसरों पर सफलता और असफलता मिली। दूसरी ओर, पाल साम्राज्य के साथ पूर्वी भारत में राजनीतिक प्रभुत्व को लेकर संघर्ष चलता रहा।

इन संघर्षों के बीच मिहिरभोज की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह थी कि उन्होंने प्रतिहार साम्राज्य की राजनीतिक शक्ति को बनाए रखने के साथ-साथ उसके पुराने प्रतिद्वंद्वियों को भी चुनौती दी। इस प्रकार उनका शासन उत्तर भारत की त्रिकोणीय शक्ति-स्पर्धा के उस दौर का महत्वपूर्ण अध्याय बन गया, जिसमें प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट तीन प्रमुख शक्तियाँ थीं।


अरब आक्रमणों के विरुद्ध प्रतिहार शक्ति


मिहिरभोज के शासन की चर्चा करते समय पश्चिम से आने वाली अरब शक्ति के विरुद्ध प्रतिहारों की भूमिका विशेष महत्व रखती है। भारतीय अभिलेख इस संघर्ष का उल्लेख करते हैं, लेकिन मिहिरभोज की अरबों के विरुद्ध सफलता का एक महत्वपूर्ण बाहरी प्रमाण अरब व्यापारी सुलेमान के विवरण में मिलता है।

सुलेमान ने मिहिरभोज की विशाल सेना और विशेष रूप से उसकी अश्वसेना की शक्ति का उल्लेख किया है। उसके विवरण में मिहिरभोज को अरबों का प्रबल विरोधी बताया गया है और उनके राज्य की समृद्धि तथा सुरक्षा व्यवस्था की भी चर्चा की गई है।

यह विवरण इसलिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह किसी प्रतिहार प्रशस्तिकार का वर्णन नहीं, बल्कि एक विदेशी यात्री और व्यापारी का विवरण है। इस प्रकार मिहिरभोज की शक्ति का आकलन करने में भारतीय अभिलेखों के साथ बाहरी स्रोत भी उपयोगी हो जाते हैं।

अरब लेखक अल-बिलादुरी के विवरण से भी यह स्पष्ट होता है कि सिंध और भारत की सीमा पर अरबों की स्थिति सहज नहीं थी। उन्हें अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों की रक्षा के लिए सुरक्षित ठिकानों की आवश्यकता पड़ती थी। अरबों द्वारा अल-महफूज जैसे नगर की स्थापना को भी इसी व्यापक राजनीतिक परिस्थिति के संदर्भ में देखा जाता है।

बाद के अरब यात्री अल-मसूदी ने भी गुर्जर-प्रतिहार शक्ति की चर्चा की है। उसके विवरण में यह संकेत मिलता है कि अरब शासकों को प्रतिहारों के आक्रमण का भय रहता था। यदि यह विवरण अपने समय के राजनीतिक संदर्भ में देखा जाए, तो यह उस प्रभाव का संकेत देता है जो प्रतिहार शक्ति ने पश्चिमी भारत में अरब विस्तार पर डाला था।

इतिहासकार लेनपूल ने भी भारत में अरब विस्तार की सीमित सफलता की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उनके अनुसार सिंध पर अरब अधिकार भारतीय इतिहास में एक सीमित प्रकरण रहा और अरब सेनाएँ भारतीय उपमहाद्वीप के विशाल भूभाग में स्थायी राजनीतिक विस्तार नहीं कर सकीं।

इतिहासकार रमेशचंद्र मजूमदार ने भी इस तथ्य को व्यापक अरब विस्तार की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण माना है। जिस समय अरब सेनाएँ पश्चिम एशिया, उत्तरी अफ्रीका और यूरोप के कुछ हिस्सों में उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त कर रही थीं, उसी दौर में भारतीय उपमहाद्वीप में उनका विस्तार अपेक्षाकृत सीमित रहा।


‘आदिवराह’ और मिहिरभोज की राजनीतिक छवि


मिहिरभोज के सिक्कों और अभिलेखों में मिलने वाली ‘आदिवराह’ उपाधि उनके राजनीतिक और धार्मिक प्रतीकवाद को समझने में महत्वपूर्ण है। वराह भारतीय परंपरा में पृथ्वी को संकट से उबारने वाले विष्णु के अवतार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए ‘आदिवराह’ की उपाधि को मिहिरभोज की राजकीय वैधता और उनके शासकीय आदर्श से जोड़कर देखा जा सकता है।

प्रतिहार नाम को भी बाद की ऐतिहासिक व्याख्याओं में ‘द्वारपाल’ के अर्थ से जोड़ा गया है। पश्चिमी सीमा से आने वाली शक्तियों के विरुद्ध प्रतिहारों की भूमिका को देखते हुए यह व्याख्या विशेष रूप से आकर्षक प्रतीत होती है। हालाँकि किसी राजवंश के नाम की व्युत्पत्ति और उसके राजनीतिक अर्थ को लेकर इतिहासकारों के बीच सावधानी आवश्यक है।

मिहिरभोज का ऐतिहासिक महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उनके अधीन एक विशाल साम्राज्य था। उनका महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने एक ऐसे समय में प्रतिहार शक्ति को संगठित और सुदृढ़ किया जब उत्तर भारत में अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ प्रभुत्व के लिए संघर्ष कर रही थीं।

उनका शासन उत्तर भारत में प्रतिहार शक्ति के उत्कर्ष का प्रतीक बना। उनके अभिलेख साम्राज्य के विस्तार और प्रशासनिक संगठन की जानकारी देते हैं, उनके सिक्के उनकी राजकीय पहचान और वैष्णव प्रतीकवाद को सामने रखते हैं, जबकि अरब यात्रियों के विवरण उनकी सैन्य शक्ति और पश्चिमी सीमाओं पर उनके प्रभाव की स्वतंत्र पुष्टि करते हैं।

इसलिए मिहिरभोज को केवल किसी एक समुदाय, जाति या राजनीतिक आख्यान के प्रतीक के रूप में देखने के बजाय नौवीं शताब्दी के उत्तर भारतीय इतिहास के एक प्रभावशाली सम्राट के रूप में देखना अधिक ऐतिहासिक दृष्टि होगी। उनके शासनकाल में गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य ने जिस राजनीतिक और सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया, उसने उत्तर भारत की सत्ता-संरचना को लंबे समय तक प्रभावित किया।



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