Ashfaq Ahmad
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बौद्ध देवी तारा: करुणा, मातृशक्ति और वज्रयान परंपरा में देवी का स्वरूप

  


देवी तारा: बौद्ध परंपरा में करुणा और मातृशक्ति की स्त्री प्रतिमा


बौद्ध परंपरा में देवी तारा को करुणा, मैत्री और संरक्षण की स्त्री-प्रतिमूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। अनेक बौद्ध परंपराओं में उन्हें बुद्धों की माता और संकट से रक्षा करने वाली देवी के रूप में देखा जाता है। यद्यपि तारा का उल्लेख बौद्ध साहित्य में पहले से मिलता है, लेकिन उनका महत्व विशेष रूप से पाँचवीं और छठी शताब्दी के आसपास बढ़ा, जब वज्रयान बौद्ध परंपरा और उससे जुड़े तांत्रिक अनुष्ठानों का विस्तार होने लगा।



बौद्ध धर्म में देवी-परंपरा के विकास को समझने के लिए इससे भी पुराने उदाहरणों पर ध्यान देना आवश्यक है। कुषाणकालीन गांधार कला में देवी हारिति की प्रतिमाएँ इसका महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। इन प्रतिमाओं में हारिति को बच्चों के साथ तथा मातृत्व के प्रतीकों के साथ चित्रित किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि बौद्ध कला और धार्मिक परंपरा में मातृदेवी की अवधारणा तारा के व्यापक लोकप्रिय स्वरूप से काफी पहले विकसित हो चुकी थी।


अवलोकितेश्वर के आँसुओं से तारा का जन्म


तारा की उत्पत्ति से जुड़ी एक प्रसिद्ध बौद्ध मान्यता उन्हें बोधिसत्व अवलोकितेश्वर से जोड़ती है। कहा जाता है कि जब अवलोकितेश्वर ने नरक में प्राणियों की अत्यंत पीड़ादायक स्थिति देखी, तो उनकी करुणा से आँसू निकल पड़े और उन्हीं आँसुओं से तारा का प्राकट्य हुआ।


यह कथा तारा के मूल स्वरूप को समझने में महत्वपूर्ण है। अवलोकितेश्वर स्वयं करुणा के बोधिसत्व माने जाते हैं और तारा उसी करुणा के स्त्री रूप के रूप में सामने आती हैं। इस दृष्टि से तारा केवल एक स्वतंत्र देवी नहीं, बल्कि बौद्ध चिंतन में करुणा की सक्रिय और संरक्षणकारी शक्ति का प्रतीक भी बन जाती हैं।


प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ मंजुश्रीमूलकल्प में तारा से जुड़े अनेक नामों का उल्लेख मिलता है। इनमें भृकुटी, मामकी, लोचना, श्वेता, पाण्डरवासिनी और सुतारा जैसे नाम प्रमुख हैं। अलग-अलग बौद्ध परंपराओं और तांत्रिक साधनाओं में तारा के स्वरूप और नामों में भी विविधता दिखाई देती है।



आठ महान भय से रक्षा करने वाली देवी


तारा की सबसे प्रसिद्ध विशेषताओं में से एक संकटों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में उनका स्वरूप है। बौद्ध परंपरा में उन्हें आठ महान भय से अपने उपासकों की रक्षा करने वाली देवी माना गया है।


इन आठ भय में सिंह, हाथी, अग्नि, सर्प, डाकू, पाप, बंदीगृह और राक्षस शामिल हैं। इन प्रतीकों को केवल बाहरी संकटों के रूप में ही नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर मौजूद भय, आसक्ति और अन्य मानसिक बंधनों के प्रतीक के रूप में भी समझा गया है।


इस प्रकार तारा की भूमिका केवल किसी संकट के समय सहायता करने वाली देवी तक सीमित नहीं रहती। वह भय से मुक्ति और आध्यात्मिक संरक्षण की अवधारणा से भी जुड़ जाती हैं।


अवलोकितेश्वर की शक्ति के रूप में तारा


तारा को कई बौद्ध तांत्रिक परंपराओं में अवलोकितेश्वर की शक्ति के रूप में भी देखा जाता है। यहाँ पुरुष और स्त्री शक्ति के पारस्परिक संबंध की वह अवधारणा दिखाई देती है जिसमें सृष्टि और चेतना को केवल एकल शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि परस्पर पूरक शक्तियों के रूप में समझा जाता है।


भारतीय धार्मिक परंपराओं में शक्ति और पुरुष के इस संबंध के अनेक रूप मिलते हैं। बौद्ध तंत्र में भी देवी और बोधिसत्व के संबंध को इसी व्यापक प्रतीकात्मक संसार के भीतर देखा जा सकता है।



तारा के विविध रूप


तारा का सामान्य स्वरूप करुणामयी और वरदायिनी देवी का है। उनकी प्रतिमाओं में वरद मुद्रा विशेष रूप से दिखाई देती है, जो आशीर्वाद और संरक्षण का प्रतीक है।


लेकिन तारा का स्वरूप हमेशा शांत और सौम्य नहीं रहता। तांत्रिक बौद्ध परंपरा में उनका एक उग्र रूप भी मिलता है, जिसे उग्रतारा कहा जाता है। इस रूप में उनका चित्रण अधिक शक्तिशाली और युद्धात्मक प्रतीकों के साथ किया जाता है। कुछ प्रतिमाओं में उनके हाथों में तलवार, ढाल, कमल और खोपड़ी जैसे आयुध एवं प्रतीक दिखाई देते हैं।


यह विविधता बौद्ध देवी-परंपरा की एक महत्वपूर्ण विशेषता को सामने लाती है। एक ही देवी करुणा और संरक्षण की कोमल शक्ति भी हो सकती है और अधर्म, भय तथा संकट के विनाश की उग्र शक्ति भी।




नालंदा और बौद्ध मूर्तिकला में तारा


तारा की अनेक महत्वपूर्ण प्रतिमाएँ बिहार के प्राचीन बौद्ध शिक्षा-केंद्र नालंदा से प्राप्त हुई हैं। नालंदा के पुरातात्त्विक अवशेषों से प्राप्त बौद्ध कांस्य प्रतिमाएँ इस बात का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं कि मध्यकालीन बौद्ध धार्मिक जीवन में देवी-उपासना कितनी विकसित हो चुकी थी।


नालंदा से प्राप्त कुछ प्रतिमाओं में तारा को अनेक भुजाओं वाले रूप में भी दिखाया गया है। ऐसी प्रतिमाओं में उनके विभिन्न हाथों में अलग-अलग आयुध और प्रतीक होते हैं, जिनका संबंध बौद्ध साधना और धार्मिक प्रतीकवाद से जोड़ा जाता है।


तारा से संबंधित बौद्ध कला को समझते समय प्रज्ञापारमिता जैसी विद्या-देवियों की परंपरा का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। बौद्ध धर्म में ज्ञान, करुणा और शक्ति को स्त्री-रूपों में व्यक्त करने की यह परंपरा केवल तारा तक सीमित नहीं थी।


इसी व्यापक धार्मिक कला-परंपरा में मारीचि और एकजटा जैसी देवियों का भी उल्लेख मिलता है। मारीचि की कुछ बौद्ध प्रतिमाओं में उनका एक मुख वराह के रूप में भी दिखाया गया है। यह बौद्ध मूर्तिकला में विभिन्न धार्मिक प्रतीकों और स्थानीय परंपराओं के जटिल अंतर्संबंध का उदाहरण है।


भारतीय धार्मिक परंपराओं में मातृशक्ति


तारा की परंपरा को भारतीय धार्मिक इतिहास के व्यापक संदर्भ में देखने पर एक रोचक तथ्य सामने आता है। भारतीय उपमहाद्वीप में विभिन्न धार्मिक परंपराओं ने मातृशक्ति की अवधारणा को अपने-अपने धार्मिक दर्शन और प्रतीक-व्यवस्था के भीतर स्थान दिया।


हिंदू परंपरा में दुर्गा, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती और अन्य देवियों के विविध रूप दिखाई देते हैं। बौद्ध परंपरा में तारा, प्रज्ञापारमिता, मारीचि और अनेक अन्य देवियाँ विकसित हुईं। जैन परंपरा में भी यक्षिणियों और शासनदेवियों की समृद्ध परंपरा मिलती है।


इन परंपराओं के बीच समानताएँ दिखाई देती हैं, लेकिन इन्हें सीधे एक-दूसरे की नकल कहना इतिहास की जटिल प्रक्रिया को अत्यधिक सरल बना देगा। प्राचीन और मध्यकालीन भारत में धार्मिक परंपराओं के बीच विचारों, प्रतीकों, देवी-देवताओं और लोकविश्वासों का आदान-प्रदान निरंतर होता रहा। स्थानीय लोकदेवताओं, प्राचीन भारतीय धार्मिक प्रतीकों और अलग-अलग धार्मिक दर्शन के सम्मिलन ने समय के साथ अनेक नए रूपों को जन्म दिया।


इसीलिए तारा को केवल बौद्ध धर्म की एक देवी के रूप में देखना उनके ऐतिहासिक महत्व को सीमित कर देता है। वह भारतीय धार्मिक और कलात्मक इतिहास में विकसित उस व्यापक परंपरा की भी प्रतिनिधि हैं, जिसमें करुणा, संरक्षण, ज्ञान और मातृशक्ति को स्त्री-रूप में अभिव्यक्ति मिली।


तारा की कहानी इस बात का उदाहरण है कि भारतीय उपमहाद्वीप की धार्मिक परंपराएँ कितनी परस्पर संबद्ध रही हैं। अलग-अलग दर्शन और संप्रदायों के बावजूद उनके प्रतीक संसार में कई समान सूत्र दिखाई देते हैं।


सभी मातृशक्तियों को नमन और वंदन।





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