Ashfaq Ahmad
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भारत-नेपाल सीमा विवाद: कालापानी और लिपुलेख पर फिर क्यों आमने-सामने हैं दोनों देश?

 


कालापानी से लिपुलेख तक: भारत-नेपाल सीमा विवाद की असली कहानी

भारत और नेपाल के संबंधों को अक्सर दो पड़ोसी देशों के बीच असाधारण सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक निकटता के उदाहरण के रूप में देखा जाता है। खुली सीमा, लोगों की आवाजाही, पारिवारिक और सांस्कृतिक संबंध, व्यापार तथा रोजगार के अवसरों ने दोनों देशों को लंबे समय से एक-दूसरे से गहराई से जोड़े रखा है। लेकिन इस निकटता का अर्थ यह नहीं है कि दोनों देशों के बीच सभी विवाद समाप्त हो चुके हैं।


इन विवादों में सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है कालापानी–लिपुलेख–लिम्पियाधुरा क्षेत्र का सीमा विवाद।


वर्षों पुराने इस विवाद ने २०२६ में एक बार फिर ध्यान खींचा है। भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे से सीमा व्यापार फिर शुरू हो चुका है, जबकि नेपाल लगातार इस क्षेत्र पर अपना दावा दोहरा रहा है। इसके अलावा कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भी लिपुलेख मार्ग के इस्तेमाल को लेकर नेपाल ने आपत्ति जताई है। इस कारण भारत और नेपाल के बीच पुराने सीमा विवाद पर एक बार फिर चर्चा तेज हुई है।


विवाद की जड़ १८१६ की सुगौली संधि में है


भारत और नेपाल के बीच आधुनिक सीमा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि १८१६ की सुगौली संधि से जुड़ी है। यह संधि एंग्लो-नेपाली युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच हुई थी। संधि में नेपाल की पश्चिमी सीमा के संदर्भ में काली नदी को महत्वपूर्ण सीमा-चिह्न बनाया गया।


यहीं से विवाद की सबसे जटिल परत सामने आती है।


दोनों देश इस बात पर सहमत नहीं हैं कि उस क्षेत्र में काली नदी का वास्तविक उद्गम किस धारा या स्रोत से माना जाए।


नेपाल का तर्क है कि काली नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है। इस व्याख्या के अनुसार काली नदी के पूर्व का क्षेत्र, जिसमें कालापानी और लिपुलेख भी शामिल हैं, नेपाल का हिस्सा होना चाहिए।


भारत की व्याख्या अलग है। भारतीय पक्ष उस क्षेत्र में काली नदी के स्रोत की पहचान अलग स्थान से करता है और ऐतिहासिक प्रशासनिक नियंत्रण तथा मानचित्र संबंधी साक्ष्यों के आधार पर कालापानी क्षेत्र को भारत का हिस्सा मानता है।


यही भिन्न भौगोलिक और ऐतिहासिक व्याख्या विवाद की मूल जटिलता है।


इसलिए यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि सुगौली संधि ने कालापानी को सीधे नेपाल या भारत को सौंप दिया था। असली विवाद यह है कि संधि में उल्लिखित काली नदी की पहचान और उसके उद्गम को किस ऐतिहासिक, भौगोलिक और प्रशासनिक साक्ष्य के आधार पर निर्धारित किया जाए।


यह विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ


कालापानी का मुद्दा २०२० में अचानक सामने नहीं आया था।


१९९० के दशक में नेपाल की घरेलू राजनीति में यह प्रश्न अधिक मुखर हुआ। १९९६ की महाकाली संधि को लेकर नेपाल में हुई राजनीतिक बहस के दौरान कालापानी का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। इसके बाद नेपाल में कालापानी को लेकर राजनीतिक और जन आंदोलनों का सिलसिला शुरू हुआ और दोनों देशों के बीच सीमा विवादों को बातचीत के माध्यम से हल करने की आवश्यकता पर चर्चा होती रही।


१९९८ में नेपाल में कालापानी को लेकर विरोध प्रदर्शन भी हुए। इसके बाद भी कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कालापानी और सुस्ता जैसे प्रमुख विवादित क्षेत्रों का अंतिम सीमांकन नहीं हो सका।

२०१४ में भारत और नेपाल ने कालापानी तथा सुस्ता सहित लंबित सीमा संबंधी मुद्दों को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाने पर सहमति जताई। दोनों देशों ने सीमा से जुड़े तकनीकी कार्यों के लिए विभिन्न द्विपक्षीय तंत्र विकसित किए।


लेकिन कालापानी का मूल विवाद बना रहा।


लिपुलेख ने विवाद को नया आयाम दिया


विवाद का एक महत्वपूर्ण मोड़ २०१५ में आया।


भारत और चीन ने उस वर्ष लिपुलेख दर्रे को सीमा व्यापार के मार्गों में शामिल करने पर सहमति जताई। नेपाल ने इसका विरोध किया, क्योंकि उसका दावा है कि लिपुलेख उसके क्षेत्र में आता है।

इस प्रकार मामला केवल भारत और नेपाल के बीच सीमा-निर्धारण का नहीं रहा, बल्कि भारत-चीन संबंधों से भी जुड़ गया।


लिपुलेख का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र हिमालयी भूगोल, भारत-चीन सीमा, कैलाश मानसरोवर यात्रा और भारत की सामरिक सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।


यही कारण है कि इस क्षेत्र से जुड़ा कोई भी बड़ा घटनाक्रम केवल द्विपक्षीय सीमा विवाद के रूप में नहीं देखा जाता।


२०२० में विवाद ने नया रूप लिया


२०१९ में भारत द्वारा नया राजनीतिक मानचित्र जारी किए जाने के बाद नेपाल में विरोध बढ़ा। इसके बाद २०२० में नेपाल ने अपना संशोधित राजनीतिक मानचित्र जारी किया, जिसमें लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को नेपाल के क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया।


नेपाल की संसद ने बाद में इस नक्शे को संवैधानिक मान्यता भी दी।


भारत ने नेपाल के इस कदम को स्वीकार नहीं किया। भारतीय पक्ष का कहना रहा है कि नेपाल द्वारा किए गए क्षेत्रीय दावे ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित नहीं हैं तथा सीमा संबंधी प्रश्नों का समाधान बातचीत के माध्यम से होना चाहिए।


यहीं से दोनों देशों के बीच इस मुद्दे को लेकर संबंधों में तीखापन काफी बढ़ गया।


चीन की भूमिका को लेकर सावधानी जरूरी है


भारत-नेपाल सीमा विवाद की चर्चा होते ही चीन का नाम आना स्वाभाविक है, क्योंकि लिपुलेख क्षेत्र चीन की सीमा के निकट है और भारत-चीन संबंधों का सामरिक पक्ष भी इससे जुड़ा हुआ है।


लेकिन यह कहना कि नेपाल ने यह विवाद केवल चीन के कहने पर खड़ा किया है, उपलब्ध इतिहास से सिद्ध नहीं होता।


नेपाल का कालापानी संबंधी दावा चीन के साथ उसके वर्तमान संबंधों से काफी पहले से मौजूद था। १९९० के दशक में ही नेपाल में यह मुद्दा घरेलू राजनीति का हिस्सा बन चुका था।


दूसरी ओर, चीन के साथ नेपाल के बढ़ते आर्थिक और अवसंरचनात्मक संबंधों ने निश्चित रूप से पूरे भू-राजनीतिक समीकरण को अधिक जटिल बनाया है। इसलिए चीन को इस विवाद के व्यापक सामरिक संदर्भ में देखा जा सकता है, लेकिन पूरे विवाद को केवल चीनी प्रभाव या किसी बाहरी शक्ति की रणनीति के रूप में समझाना उचित नहीं होगा।


भारत और नेपाल की आर्थिक वास्तविकता


नेपाल और भारत के आर्थिक संबंध बेहद गहरे हैं। भारत नेपाल के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में है और दोनों देशों के बीच व्यापार, पारगमन, ऊर्जा, रोजगार तथा निवेश के व्यापक संबंध हैं।


नेपाल ने इसी बीच चीन के साथ भी व्यापार, अवसंरचना और संपर्क बढ़ाने की कोशिश की है। लेकिन भौगोलिक स्थिति और मौजूदा आर्थिक संरचना के कारण चीन भारत का पूर्ण आर्थिक विकल्प नहीं बन पाया है।


इसलिए नेपाल की विदेश नीति को केवल भारत बनाम चीन के चश्मे से देखना भी पर्याप्त नहीं है।

काठमांडू के लिए दोनों पड़ोसी महत्वपूर्ण हैं और नेपाल अपनी सामरिक तथा आर्थिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता रहा है।


२०२६ में स्थिति क्या है?


यहाँ पुराने विश्लेषण को अद्यतन करना आवश्यक है।


२०२० के बाद नेपाल की राजनीति में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। मार्च २०२६ के आम चुनाव के बाद बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बने। नई सरकार के दौर में भी कालापानी–लिपुलेख–लिम्पियाधुरा विवाद समाप्त नहीं हुआ है।


नेपाल की वर्तमान सरकार ने फिर स्पष्ट किया है कि वह लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानती है। नेपाल का आधिकारिक रुख यह भी है कि सीमा विवाद को ऐतिहासिक दस्तावेजों, मानचित्रों, प्रमाणों और कूटनीतिक बातचीत के माध्यम से हल किया जाना चाहिए।


भारत की ओर से भी यह रुख दोहराया गया है कि क्षेत्रीय दावों का समाधान ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए तथा सीमा संबंधी प्रश्नों को बातचीत से सुलझाया जाना चाहिए।

इसका अर्थ यह है कि सरकारें बदलने के बावजूद मूल विवाद समाप्त नहीं हुआ है।


लिपुलेख व्यापार ने फिर बढ़ाया तनाव


इस विवाद का सबसे नया पहलू भारत और चीन के बीच लिपुलेख के रास्ते सीमा व्यापार का फिर शुरू होना है।


२०२५ में भारत और चीन के बीच लिपुलेख सहित पारंपरिक सीमा व्यापार मार्गों को फिर खोलने की दिशा में सहमति बनी थी। इसके बाद २०२६ में कई वर्षों के अंतराल के बाद लिपुलेख के रास्ते व्यापार वास्तव में फिर शुरू हुआ।


नेपाल ने इस पर औपचारिक आपत्ति जताई, क्योंकि वह लिपुलेख को अपने संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा मानता है।


इसी तरह २०२६ में कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख मार्ग के इस्तेमाल को लेकर भी नेपाल ने भारत और चीन के सामने अपनी आपत्ति दर्ज कराई।


इस घटनाक्रम ने पुराने विवाद को फिर सक्रिय कर दिया है।


लिपुलेख का प्रश्न अब केवल नेपाल और भारत के बीच पुरानी सीमा-रेखा का विवाद नहीं रह गया है। इसमें भारत-चीन व्यापार, हिमालयी संपर्क, कैलाश मानसरोवर यात्रा, भारत-चीन संबंधों में बदलाव और नेपाल की संप्रभुता संबंधी चिंता—सभी एक साथ जुड़ गए हैं।


क्या यह केवल नेपाल की घरेलू राजनीति का मुद्दा है?


भारत-नेपाल सीमा विवाद को केवल नेपाल की घरेलू राजनीति का विषय मानना उचित नहीं होगा।


नेपाल की घरेलू राजनीति निश्चित रूप से इस विवाद को प्रभावित करती है। सीमा और संप्रभुता जैसे मुद्दे किसी भी देश में राजनीतिक रूप से संवेदनशील होते हैं। लेकिन कालापानी–लिपुलेख का मामला वास्तविक सीमा-निर्धारण, ऐतिहासिक मानचित्रों, नदी के उद्गम, प्रशासनिक नियंत्रण और भारत-चीन के सामरिक संबंधों से भी जुड़ा हुआ है।


इसलिए इसे केवल चुनावी राजनीति का राजनीतिक दांव कहना भी पर्याप्त नहीं होगा।


वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।


भारत और नेपाल दोनों इस क्षेत्र पर अपना-अपना ऐतिहासिक और कानूनी पक्ष रखते हैं। दोनों देशों के बीच सीमा के अधिकांश हिस्से पर तकनीकी और प्रशासनिक सहयोग जारी है, लेकिन लिम्पियाधुरा–लिपुलेख–कालापानी और सुस्ता अब भी ऐसे क्षेत्र हैं जिनका अंतिम सीमांकन पूरा नहीं हुआ है।


इसका समाधान किसी सोशल मीडिया बहस, राष्ट्रवादी नारे या एकतरफा नक्शे से नहीं होगा।


इसके लिए दोनों देशों को ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुराने मानचित्रों, प्रशासनिक अभिलेखों, नदी-भूगोल और सीमा-सर्वेक्षण से जुड़े प्रमाणों पर बैठकर बातचीत करनी होगी।


भारत और नेपाल के बीच संबंध इतने व्यापक हैं कि एक सीमा विवाद उन्हें पूरी तरह परिभाषित नहीं कर सकता। दोनों देशों के बीच खुली सीमा, लोगों की आवाजाही, व्यापार, रोजगार, सुरक्षा, ऊर्जा और सांस्कृतिक संबंध कहीं अधिक व्यापक हैं।


कालापानी का विवाद वास्तविक, पुराना और संवेदनशील है। लेकिन इसका समाधान भी अंततः उसी रास्ते से निकल सकता है जिस पर दोनों देश औपचारिक रूप से अब तक सहमत रहे हैं— संवाद, प्रमाण और द्विपक्षीय कूटनीति।


Note: मूल आलेख एवं विषय-विचार: धर्मेंद्र कुमार

पुनर्लेखन, तथ्य-जाँच एवं संपादकीय प्रस्तुति: आखरवाणी संपादकीय



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