समाज में ऊँच-नीच और वर्ग विभाजन की शुरुआत कैसे हुई? इतिहास, धर्म और जाति की कहानी

 


समाज में ऊँच-नीच और वर्ग विभाजन की शुरुआत कैसे हुई?


आज दुनिया के लगभग हर समाज में किसी न किसी रूप में आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक असमानता दिखाई देती है। कहीं धन और सत्ता के आधार पर वर्ग बने, कहीं जाति और वंश के आधार पर सामाजिक दर्जा तय हुआ, तो कहीं धर्म, नस्ल या लिंग के आधार पर लोगों के अधिकारों में अंतर पैदा हुआ।


लेकिन क्या मनुष्य के इतिहास की शुरुआत से ही समाज ऐसा था?


नहीं कहा जा सकता।


और यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सामाजिक असमानता को किसी एक व्यक्ति, एक धर्म या एक घटना से जोड़ देना इतिहास को बहुत सरल बना देता है।


मानव समाज में ऊँच-नीच की कहानी हजारों वर्षों में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग परिस्थितियों में विकसित हुई है।


मानव समाज हमेशा एक जैसा नहीं था


आधुनिक मनुष्य यानी होमो सेपियंस लाखों वर्षों के मानव विकास की लंबी प्रक्रिया का परिणाम है। यह कहना कि मनुष्य आज के बंदरों से विकसित हुआ, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।


मनुष्य और आज के चिम्पैंजी, गोरिल्ला जैसे कपि एक-दूसरे से विकसित नहीं हुए। बल्कि मनुष्य और इन जीवों के बहुत पुराने पूर्वजों की कोई साझा विकासवादी शाखा रही है।


मानव इतिहास के शुरुआती चरणों में मनुष्य छोटे समूहों में रहता था। शिकार, संग्रह, मछली पकड़ना, पौधों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहना उसके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।


ऐसे समाजों में आज जैसी स्थायी राज्य व्यवस्था, विशाल निजी संपत्ति या वंशानुगत राजशाही सामान्य नहीं थी।


लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि वे समाज पूरी तरह समानतावादी थे।


मानवशास्त्रीय शोध से पता चलता है कि शुरुआती मानव समुदायों में भी उम्र, लिंग, कौशल, प्रतिष्ठा और सामाजिक संबंधों के आधार पर अलग-अलग भूमिकाएं और प्रभाव मौजूद हो सकते थे।


इसलिए “पहले सभी मनुष्य बिल्कुल बराबर थे और फिर एक दिन किसी ने दूसरों पर राज करना शुरू कर दिया”—इतिहास इतना सीधा नहीं है।


खेती ने समाज को बदल दिया


लगभग दस से बारह हजार वर्ष पहले दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कृषि और पशुपालन का विकास शुरू हुआ।


इस परिवर्तन का मानव समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा।


जब लोग एक जगह लंबे समय तक रहने लगे और भोजन का उत्पादन करने लगे, तो स्थायी बस्तियां विकसित हुईं। धीरे-धीरे भूमि, पशुधन, अनाज और अन्य संसाधनों का संचय संभव हुआ।


यहीं से सामाजिक और आर्थिक अंतर बढ़ने की नई संभावनाएं पैदा हुईं।


कुछ लोगों के पास अधिक संसाधन जमा होने लगे, कुछ लोग प्रशासन या युद्ध से जुड़े, कुछ धार्मिक अनुष्ठानों के विशेषज्ञ बने और कुछ लोग खेती, शिल्प तथा दूसरे श्रम करते रहे।


बड़ी बस्तियों और शुरुआती नगरों के विकास के साथ श्रम-विभाजन भी अधिक जटिल होता गया।

और जब संसाधन असमान रूप से बंटने लगे, तो सामाजिक असमानता को स्थायी रूप मिलने की संभावना भी बढ़ी।


सत्ता और संपत्ति के साथ आया सामाजिक स्तरीकरण


समाजशास्त्र में इस प्रक्रिया को सामाजिक स्तरीकरण कहा जाता है।


इसका अर्थ है कि समाज में लोगों या समूहों की स्थिति समान न रहकर अलग-अलग स्तरों में बंटने लगे।


कहीं राजा और प्रजा का अंतर पैदा हुआ, कहीं कुलीन और सामान्य लोगों का, कहीं स्वतंत्र नागरिक और दास का।


प्राचीन मेसोपोटामिया, मिस्र, यूनान, रोम, चीन, भारत और दुनिया के दूसरे हिस्सों में अलग-अलग प्रकार की सामाजिक श्रेणियां विकसित हुईं।


इन सभी समाजों की व्यवस्था एक जैसी नहीं थी।


लेकिन एक सामान्य प्रवृत्ति दिखाई देती है— जब सत्ता, भूमि, संपत्ति और संस्थागत अधिकार कुछ समूहों के हाथों में केंद्रित होते हैं, तो सामाजिक असमानता को स्थायी रूप मिल सकता है।


धर्म और सामाजिक व्यवस्था का संबंध


मानव समाजों में धर्म और धार्मिक संस्थाओं ने भी सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित किया।


प्राचीन मनुष्य प्राकृतिक घटनाओं के वैज्ञानिक कारण नहीं समझता था, इसलिए वर्षा, सूखा, बीमारी, बिजली, बाढ़ और मृत्यु जैसी घटनाओं की धार्मिक व्याख्याएं विकसित होना स्वाभाविक था।


लेकिन यह कहना कि किसी एक “धार्मिक वर्ग” ने बैठकर ईश्वर की कल्पना की और फिर जानबूझकर लोगों पर शासन करने के लिए धर्म बना दिया, ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध नहीं है।


धर्मों की उत्पत्ति बेहद जटिल सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं से हुई।


कई धार्मिक परंपराओं ने सामाजिक पदानुक्रम को वैधता दी, लेकिन कई धार्मिक और दार्शनिक आंदोलनों ने उसी पदानुक्रम को चुनौती भी दी।


यानी धर्म हमेशा केवल सत्ता का उपकरण रहा— ऐसा निष्कर्ष भी उतना ही सरलीकृत होगा।


भारत में वर्ण और जाति की कहानी


भारतीय समाज की सामाजिक संरचना को समझने के लिए वर्ण और जाति के बीच अंतर करना जरूरी है।


वैदिक और उत्तरवैदिक साहित्य में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जैसे वर्णों का उल्लेख मिलता है। लेकिन ऐतिहासिक भारत का वास्तविक सामाजिक जीवन केवल इन चार वर्णों में सीमित नहीं था।

समय के साथ अलग-अलग क्षेत्रों, व्यवसायों, समुदायों और वंश समूहों से जुड़ी अनेक जातियां और उपजातियां विकसित हुईं।


जाति व्यवस्था का वास्तविक स्वरूप क्षेत्र, काल और समुदाय के अनुसार बहुत अलग रहा।


इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि शुरुआत में भारत में जाति पूरी तरह “कर्म आधारित” थी और बाद में अचानक “जन्म आधारित” हो गई।


वर्ण और जाति के संबंध ऐतिहासिक रूप से अधिक जटिल हैं। जन्म, पेशा, सामाजिक प्रतिष्ठा, विवाह, धार्मिक नियम और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग कालों में इन व्यवस्थाओं को प्रभावित करती रही हैं।


असमानता को चुनौती देने वाली आवाजें भी पुरानी हैं


सामाजिक ऊँच-नीच के खिलाफ आवाज आधुनिक लोकतंत्र के साथ पैदा नहीं हुई।


भारत में भी बहुत पुराने समय से ऐसी धार्मिक और दार्शनिक परंपराएं रही हैं जिन्होंने जन्म के आधार पर श्रेष्ठता के विचार पर सवाल उठाए।


गौतम बुद्ध इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।


बौद्ध परंपरा में व्यक्ति के नैतिक और आध्यात्मिक मूल्य को उसके जन्म से स्वतंत्र माना गया। बुद्ध के संघ में विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों के शामिल होने की परंपरा भी रही।


बौद्ध संघ में महिलाओं को शामिल किए जाने की परंपरा भी विकसित हुई, हालांकि उस व्यवस्था में पुरुष और महिला संघों के बीच समानता का प्रश्न आज के आधुनिक अर्थों में नहीं था।


बुद्ध ने पशुबलि और कई प्रचलित धार्मिक धारणाओं की आलोचना भी की।


बाद में सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया और उसके प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


लेकिन बुद्ध को सीधे आधुनिक अर्थ में “जातिवाद विरोधी सामाजिक क्रांतिकारी” कह देना भी इतिहास को वर्तमान राजनीतिक भाषा में ढाल देना होगा। उनकी शिक्षाओं और उस समय के सामाजिक संदर्भ को उनके अपने ऐतिहासिक संदर्भ में समझना अधिक उचित है।


शंकराचार्य और चांडाल की कथा


आदि शंकराचार्य से जुड़ी मनीषा पंचकम् की प्रसिद्ध कथा भी सामाजिक ऊँच-नीच की चर्चा में अक्सर सामने आती है।


कथा के अनुसार शंकराचार्य के सामने एक चांडाल आया और दोनों के बीच यह प्रश्न उठा कि रास्ते से हटने के लिए किसे कहा जा रहा है—शरीर को या आत्मा को?


इस कथा में अद्वैत वेदांत का एक महत्वपूर्ण दार्शनिक विचार सामने आता है कि आत्मा के स्तर पर मूलभूत भेद का प्रश्न अलग तरह से देखा जाना चाहिए।


शंकराचार्य की ओर से चांडाल को ज्ञान का स्रोत स्वीकार करने वाली यह कथा सामाजिक समानता के आधुनिक आंदोलन का घोषणापत्र नहीं है, लेकिन यह अद्वैत दर्शन की उस धारणा से जुड़ी है जिसमें अंतिम सत्य के स्तर पर आत्मा और ब्रह्म की एकता पर जोर दिया जाता है।


इसीलिए इसे सामाजिक ऊँच-नीच के प्रश्न से जोड़कर पढ़ा जा सकता है, लेकिन इसे सीधे आधुनिक जाति-विरोधी आंदोलन कहना उचित नहीं होगा।


शंकराचार्य के जीवन और उनके मठों से जुड़ी परंपराओं में भी कई ऐसे प्रसंग हैं जिनके ऐतिहासिक विवरण को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद हैं।


रामानुज और समानता की परंपरा


रामानुजाचार्य से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा में एक गुप्त मंत्र का उल्लेख मिलता है।


कथा के अनुसार उनके गुरु ने उन्हें एक ऐसा मंत्र दिया जिसे किसी अन्य व्यक्ति को न बताने की शर्त रखी थी। लेकिन रामानुज ने मंदिर की ऊंची जगह पर चढ़कर वह मंत्र सबको बता दिया।


जब गुरु ने उनसे पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो रामानुज का उत्तर था कि यदि इस ज्ञान से बहुत से लोगों का कल्याण होता है और उसके लिए उन्हें स्वयं दंड भुगतना पड़े, तो वे तैयार हैं।


यह कथा ऐतिहासिक दस्तावेज से अधिक धार्मिक परंपरा और रामानुज की भक्ति परंपरा में प्रचलित प्रसंग के रूप में देखी जाती है।


फिर भी इसका नैतिक संदेश महत्वपूर्ण है—आध्यात्मिक ज्ञान को केवल किसी विशेष सामाजिक समूह तक सीमित न रखने की भावना।


रामानुज के विशिष्टाद्वैत दर्शन और उनकी भक्ति परंपरा ने भारतीय धार्मिक इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला।


भक्ति आंदोलन ने भी जन्म आधारित श्रेष्ठता पर सवाल उठाए


मध्यकाल में भक्ति की अनेक धाराओं ने सामाजिक और धार्मिक पदानुक्रम को चुनौती दी।


कबीर ने बाहरी आडंबर, धार्मिक पाखंड और जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की धारणा पर तीखे सवाल उठाए।


गुरु नानक ने भी मनुष्य की समानता और जातिगत भेदभाव के विरोध पर जोर दिया। सिख परंपरा में सामूहिक भोजन यानी लंगर ने भी सामाजिक बराबरी का महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक रूप विकसित किया।


यहां भी एक बात समझना जरूरी है—भक्ति आंदोलन कोई एक संगठन या एक जैसी विचारधारा नहीं था। अलग-अलग संतों की शिक्षाएं और सामाजिक दृष्टियां अलग थीं।


लेकिन उनमें से कई धाराओं ने यह सवाल जरूर उठाया कि मनुष्य की आध्यात्मिक या नैतिक कीमत उसके जन्म से क्यों तय होनी चाहिए।


आधुनिक भारत में सामाजिक सुधार की नई लड़ाई


उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय समाज में सामाजिक सुधार के कई महत्वपूर्ण आंदोलन सामने आए।


राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ अभियान चलाया। उनके प्रयासों और अन्य सुधारकों की भूमिका के बीच १८२९ में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून आया।


ज्योतिराव फुले ने जातिगत भेदभाव और ब्राह्मणवादी सामाजिक वर्चस्व की आलोचना की। सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों और वंचित समुदायों की शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण काम किया। फातिमा शेख भी इस शिक्षा आंदोलन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण हस्ती थीं।


ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह के लिए व्यापक अभियान चलाया और उनके प्रयासों के बाद १८५६ में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित हुआ।


बीसवीं शताब्दी में पेरियार ने जाति और धार्मिक रूढ़ियों की तीखी आलोचना की।


और डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ संघर्ष को आधुनिक लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक समानता से जोड़ा।


महात्मा गांधी ने भी अस्पृश्यता के खिलाफ अभियान चलाया, हालांकि जाति और वर्ण व्यवस्था को लेकर गांधी और आंबेडकर के विचारों में महत्वपूर्ण मतभेद थे।


यानी सामाजिक समानता के लिए संघर्ष करने वाले सभी लोगों की विचारधारा एक जैसी नहीं थी।


ऊँच-नीच इतनी आसानी से खत्म क्यों नहीं होती?


क्योंकि सामाजिक असमानता केवल किसी एक धार्मिक ग्रंथ या कानून से पैदा नहीं होती।


इसके पीछे सत्ता, संपत्ति, शिक्षा, पेशा, भूमि, सामाजिक प्रतिष्ठा, विवाह संबंध, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पीढ़ियों से चले आ रहे सामाजिक व्यवहार जैसे अनेक कारण काम करते हैं।


एक कानून किसी भेदभावपूर्ण प्रथा को अपराध घोषित कर सकता है, लेकिन लोगों की सामाजिक मानसिकता बदलने में अधिक समय लग सकता है।


इसीलिए आधुनिक लोकतंत्र ने समानता को कानून में स्थापित करने के बावजूद जाति, वर्ग, नस्ल, लिंग और आर्थिक असमानता जैसे प्रश्नों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया है।


असमानता की कहानी केवल भारत की कहानी नहीं है


यह भी समझना जरूरी है कि सामाजिक ऊँच-नीच को केवल भारतीय समाज की समस्या मानना इतिहास को अधूरा देखना होगा।


प्राचीन रोम में दास और स्वतंत्र नागरिकों के बीच विशाल अंतर था। यूरोप में सामंती व्यवस्था ने जन्म और भूमि के आधार पर सामाजिक श्रेणियां बनाई थीं। अमेरिका में नस्लीय दासता की व्यवस्था सदियों तक चली। दुनिया के अनेक समाजों में महिलाओं को लंबे समय तक राजनीतिक और संपत्ति संबंधी अधिकारों से वंचित रखा गया।


हर समाज ने असमानता के अपने रूप विकसित किए और अलग-अलग समय में उनके खिलाफ आंदोलन भी हुए।


आखिर ऊँच-नीच खत्म क्यों नहीं होती?


क्योंकि मनुष्य केवल आर्थिक प्राणी नहीं है। वह पहचान, प्रतिष्ठा, समुदाय और सत्ता की इच्छा से भी संचालित होता है।


जब किसी समूह को लंबे समय तक कोई विशेषाधिकार मिलता है, तो वह विशेषाधिकार केवल कानून से समाप्त नहीं होता। उसे सामाजिक व्यवहार, संस्थाओं और मानसिकता में भी चुनौती देनी पड़ती है।


यही कारण है कि बुद्ध से लेकर कबीर, गुरु नानक, फुले, सावित्रीबाई, पेरियार और आंबेडकर तक सामाजिक समानता की अलग-अलग आवाजें उठती रहीं—और फिर भी असमानता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।


शायद सामाजिक ऊँच-नीच को समझने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका यही है कि इसे किसी एक धर्म, जाति या व्यक्ति की बनाई हुई व्यवस्था न मानकर मानव समाज में सत्ता और संसाधनों के असमान वितरण की एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाए।


और इसी वजह से यह कहानी आज भी खत्म नहीं हुई है।


—मूल आलेख एवं विषय-विचार: धर्मेंद्र कुमार

पुनर्लेखन, तथ्य-जाँच एवं संपादकीय प्रस्तुति: आखरवाणी संपादकीय

No comments