सिकंदर और मालव दुर्ग: एरियन के विवरण में सिकंदर का घातक युद्ध

 

सिकंदर और मालवों का युद्ध: यूनानी इतिहासकार एरियन ने दुर्ग पर हमले को कैसे दर्ज किया?


सिकंदर के भारतीय अभियान की चर्चा प्रायः झेलम के युद्ध और पोरस के साथ उसके संघर्ष तक सीमित कर दी जाती है, लेकिन भारत में उसकी आगे की यात्रा कहीं अधिक कठिन और रक्तरंजित थी। पंजाब के क्षेत्रों से आगे बढ़ते हुए सिकंदर का सामना मालवों से हुआ, जिन्हें यूनानी लेखकों ने मल्लोई के नाम से दर्ज किया है।


मालव उस समय एक शक्तिशाली गणसमुदाय थे और रावी नदी के आसपास के क्षेत्र में उनका प्रभाव था। सिकंदर की सेना और मालवों के बीच हुए संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण विवरण यूनानी इतिहासकार एरियन की कृति अलेक्जेंडर का अभियान में मिलता है।


एरियन ने यह ग्रंथ पहली या दूसरी शताब्दी ईस्वी के आसपास लिखा था। उसके प्रमुख स्रोत सिकंदर के अभियानों में उसके साथ रहे दो महत्वपूर्ण सेनानायकों के विवरण थे—अरिस्टोबुलस और लागुस के पुत्र टॉलेमी। टॉलेमी आगे चलकर मिस्र का शासक बना और टॉलेमी वंश की स्थापना की।


इसलिए सिकंदर के भारतीय अभियान को समझने में एरियन का विवरण विशेष महत्व रखता है, यद्यपि यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि वह स्वयं सिकंदर के समय का लेखक नहीं था और उसके विवरण की तुलना अन्य प्राचीन स्रोतों से करना आवश्यक है।



रावी के किनारे मालवों से युद्ध


सिकंदर का मालवों से पहला बड़ा संघर्ष रावी नदी के क्षेत्र में हुआ। यूनानी सेना को मालवों के विरुद्ध सफलता मिली, लेकिन इस विजय के पीछे केवल यूनानी सैन्य शक्ति ही कारण नहीं थी।


मालवों को सिकंदर की सेना की वास्तविक स्थिति और उसकी तत्कालीन कमजोरी का पूरा अनुमान नहीं था। यूनानी सेना का एक बड़ा हिस्सा उस समय नदी के दूसरी ओर था। सिकंदर ने इसी स्थिति का लाभ उठाकर मालवों पर अचानक और तीव्र आक्रमण किया।


लेकिन इसके बाद जिस दुर्ग पर सिकंदर ने हमला किया, वहाँ स्थिति पूरी तरह बदल गई।


मालव दुर्ग पर सिकंदर का हमला


एरियन के अनुसार, मालव दुर्ग पर कई झड़पों के बाद भी यूनानी सेना उस पर अधिकार नहीं कर सकी थी। यूनानी सैनिक दुर्ग की सुरक्षा दीवार को तोड़ने का प्रयास कर रहे थे। कुछ सैनिक सीढ़ियों के सहारे दीवार पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे, जबकि दूसरी ओर मालव सैनिक अपने दुर्ग की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार थे।


सिकंदर ने जब देखा कि सीढ़ियाँ लगाने और दीवार पर चढ़ने में उसके सैनिक अपेक्षा से अधिक समय लगा रहे हैं, तो वह स्वयं आगे बढ़ा। उसने सीढ़ी लगाई और दीवार पर चढ़ने लगा।


उसके पीछे प्यूकास्टस था, जिसके हाथ में एक विशेष ढाल थी। एरियन के अनुसार यह वही पवित्र ढाल थी जिसे सिकंदर ट्रॉय के एथेना मंदिर से प्राप्त करके अपने साथ लाया था।


सिकंदर के पीछे उसका विश्वस्त अंगरक्षक लियानेट्स भी चढ़ रहा था। अब्रियस नामक सैनिक भी आगे बढ़ा, जिसे अन्य सैनिकों की तुलना में दुगुना वेतन मिलता था।


इस पूरे दृश्य में सिकंदर स्वयं अपने सैनिकों से आगे था। वह दुर्ग की दीवार पर पहुँच चुका था और अपने साथियों के साथ मालव सैनिकों को पीछे धकेलने लगा।

दुर्ग की दीवार पर सिकंदर


दीवार पर पहुँचने के बाद यूनानी सैनिकों और मालव रक्षकों के बीच भीषण संघर्ष शुरू हुआ। एरियन के विवरण में इसके बाद की स्थिति अत्यंत नाटकीय हो जाती है।


सिकंदर और उसके साथियों के ऊपर से लगातार आक्रमण हो रहे थे। इसी दौरान जिस सीढ़ी के सहारे यूनानी सैनिक ऊपर आ रहे थे, वह टूट गई। इसके कारण नीचे चढ़ रहे अनेक सैनिक गिर पड़े और सिकंदर दीवार के ऊपर लगभग अकेला रह गया।


अब सिकंदर चारों ओर से घिरा हुआ था। मालव सैनिक उस पर दूर से आक्रमण कर रहे थे। वे उसके अत्यंत निकट आने से भी बच रहे थे, क्योंकि सिकंदर के साथियों और उसकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से वे परिचित थे।


एरियन सिकंदर की इस स्थिति को अत्यंत वीरतापूर्ण रूप में प्रस्तुत करता है। लेकिन इसी प्रसंग में उसकी रणनीतिक सोच भी सामने आती है।


सिकंदर ने समझा कि यदि वह इसी तरह दीवार पर खड़ा रहा तो लंबे समय तक जीवित रहना कठिन होगा। उसके सामने दो विकल्प थे—या तो वह वापस लौटने की कोशिश करे या दुर्ग के भीतर उतरकर मालवों के बीच भय और अव्यवस्था पैदा करे।


उसने दूसरा रास्ता चुना।


सिकंदर दुर्ग के भीतर उतर गया


एरियन के अनुसार सिकंदर ने यह विचार किया कि यदि वह दुर्ग के भीतर लड़ते हुए मारा भी जाता है तो उसकी मृत्यु साधारण मृत्यु नहीं होगी। वह एक ऐसे योद्धा के रूप में याद किया जाएगा जिसने युद्धभूमि से पीछे हटने के बजाय शत्रु के बीच जाकर लड़ते हुए प्राण दिए।


इसी निर्णय के बाद सिकंदर दुर्ग के भीतर कूद गया।


लेकिन यह निर्णय उसके लिए लगभग घातक सिद्ध हुआ।


मालव सैनिकों ने उस पर तीर चलाए और सिकंदर कई स्थानों पर घायल हुआ। इनमें से एक तीर इतनी गंभीर चोट पहुँचा चुका था कि उसे निकालने के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव हुआ और सिकंदर बेहोश हो गया।


जब यूनानी सैनिकों ने अपने राजा को इस अवस्था में देखा तो उनमें भारी उन्माद और क्रोध फैल गया। सिकंदर के घायल होने से उनका युद्ध और भी हिंसक हो गया।

मालवों का संहार


अंततः यूनानी सेना ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इसके बाद मालवों के साथ अत्यंत व्यापक हिंसा हुई। प्राचीन स्रोतों के अनुसार दुर्ग के भीतर मौजूद लोगों का बड़ी संख्या में वध किया गया और इस हिंसा में स्त्रियाँ और बच्चे भी मारे गए।


सिकंदर के घायल होने की गंभीरता इतनी अधिक थी कि उसके मरने की अफवाह भी फैल गई। उसकी सेना के बीच यह भय फैल गया कि उनका सेनापति और विजेता अब जीवित नहीं है।


सिकंदर के जीवित बचने के बाद उसे सैनिकों के सामने दिखाया गया। कुछ समय बाद वह घोड़े पर सवार होकर अपने सैनिकों के सामने आया ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वह अभी जीवित है।


उसका जीवित रहना उसके सैनिकों के लिए केवल व्यक्तिगत राहत का विषय नहीं था। सिकंदर की सेना की पूरी राजनीतिक और सैन्य संरचना उसके व्यक्तित्व और नेतृत्व पर अत्यधिक निर्भर थी।


क्या सिकंदर मालव दुर्ग में ही मर गया था?


यहीं से इतिहास और अनुमान की सीमा अलग हो जाती है।


एक वैकल्पिक संभावना यह प्रस्तुत की जाती है कि सिकंदर वास्तव में मालव दुर्ग में ही मारा गया था और बाद में उसकी मृत्यु की सूचना छिपाई गई। इस विचार के अनुसार उसके विशाल साम्राज्य और सेना को तत्काल टूटने से बचाने के लिए उसकी मृत्यु को कुछ समय तक गुप्त रखा गया होगा।


इस संभावना को कुछ लोग इस तथ्य से जोड़ते हैं कि सिकंदर की वापसी के दौरान उसके साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों में विद्रोह हुए और कुछ यूनानी शासक भी मारे गए।


लेकिन उपलब्ध प्राचीन स्रोत इस सिद्धांत की पुष्टि नहीं करते। एरियन, प्लूटार्क, डायोडोरस और अन्य प्राचीन लेखकों की परंपरा में सिकंदर मालव अभियान के बाद भी जीवित रहता है और उसकी मृत्यु बाबुल में हुई बताई जाती है।


इसलिए मालव दुर्ग में सिकंदर की मृत्यु का विचार एक ऐतिहासिक परिकल्पना या वैकल्पिक संभावना के रूप में चर्चा योग्य हो सकता है, लेकिन वर्तमान उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इसे स्थापित ऐतिहासिक तथ्य नहीं कहा जा सकता।



इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न


मालव दुर्ग का प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिकंदर की अजेयता की लोकप्रिय छवि को एक अलग दृष्टि से देखने का अवसर देता है।


वह एक अत्यंत सफल सेनानायक था, लेकिन भारतीय अभियान के अंतिम चरण में उसे कई ऐसे प्रतिरोधों का सामना करना पड़ा जिनमें उसकी सेना को भारी कठिनाइयाँ उठानी पड़ीं। मालवों के दुर्ग पर उसका हमला इतना जोखिमपूर्ण था कि वह स्वयं मृत्यु के अत्यंत निकट पहुँच गया।


एरियन का विवरण सिकंदर को एक वीर योद्धा के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन उसी विवरण के भीतर युद्ध की भयावहता भी दिखाई देती है—दुर्ग की घेराबंदी, दीवारों पर संघर्ष, घायल सैनिक, सिकंदर का गंभीर रूप से घायल होना और अंततः दुर्ग के भीतर व्यापक नरसंहार।


मालवों की पराजय सिकंदर की सैन्य सफलता थी, लेकिन उनके प्रतिरोध की तीव्रता इस बात का प्रमाण भी है कि भारतीय अभियान उसके लिए कोई सरल विजय-यात्रा नहीं था।


और शायद इसी कारण मालव दुर्ग का प्रसंग सिकंदर की कथा में सबसे अधिक ध्यान देने योग्य घटनाओं में से एक है—क्योंकि यहाँ विजेता सिकंदर पहली बार नहीं, बल्कि लगभग मृत्यु के द्वार तक पहुँचता हुआ दिखाई देता है।



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