Ashfaq Ahmad
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अलेक्जेंडर लुकाशेंको की कहानी: ३२ साल से बेलारूस की सत्ता पर कैसे कायम हैं?

 


लुकाशेंको: बेलारूस के राष्ट्रपति जो १९९४ से सत्ता में हैं


पूर्वी यूरोप का छोटा-सा देश बेलारूस सोवियत संघ के विघटन के बाद स्वतंत्र हुआ, लेकिन उसकी राजनीति ने जल्द ही लोकतांत्रिक संक्रमण की अलग राह पकड़ ली। १९९४ में पहली बार राष्ट्रपति बने अलेक्जेंडर लुकाशेंको आज भी देश की सत्ता पर हैं।


तीन दशक से अधिक समय तक किसी देश का राष्ट्रपति बने रहना अपने आप में असाधारण है।

लेकिन लुकाशेंको की कहानी केवल उनकी लंबी सत्ता की कहानी नहीं है। यह उस राजनीतिक व्यवस्था की कहानी भी है जिसमें संवैधानिक बदलाव, जनमत-संग्रह, कमजोर विपक्ष, राज्य-नियंत्रित मीडिया और रूस पर बढ़ती निर्भरता ने राष्ट्रपति पद को लगातार मजबूत किया।


सोवियत संघ से स्वतंत्र बेलारूस और लुकाशेंको का उदय


बेलारूस सोवियत संघ का हिस्सा था। अगस्त १९९१ में उसने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की और सोवियत संघ के विघटन के साथ उसकी स्वतंत्रता स्थायी रूप से स्थापित हो गई।


स्वतंत्र बेलारूस ने १९९४ में नया संविधान अपनाया और राष्ट्रपति पद को शासन व्यवस्था का केंद्रीय पद बनाया। उसी वर्ष जून-जुलाई में हुए पहले राष्ट्रपति चुनाव में अलेक्जेंडर लुकाशेंको विजयी हुए।

उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही व्यक्ति आने वाले तीन दशकों तक देश की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा बना रहेगा।


लेकिन लुकाशेंको ने धीरे-धीरे राष्ट्रपति पद की शक्तियों को इतना मजबूत किया कि बेलारूस की राजनीतिक व्यवस्था अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई।


१९९६ का जनमत-संग्रह: सत्ता का बड़ा मोड़


लुकाशेंको के शासन में सबसे निर्णायक मोड़ों में से एक १९९६ का संवैधानिक जनमत-संग्रह था।


इस जनमत-संग्रह के बाद राष्ट्रपति की शक्तियां काफी बढ़ गईं और संसद के साथ सत्ता का संतुलन राष्ट्रपति के पक्ष में झुक गया। राष्ट्रपति का कार्यकाल भी पुनर्गठित संवैधानिक व्यवस्था के तहत आगे बढ़ा।


यही वह दौर था जब लुकाशेंको की शासन शैली को लेकर घरेलू विपक्ष और पश्चिमी देशों की चिंताएं बढ़ने लगीं।


इसके बाद बेलारूस में सत्ता परिवर्तन की संभावना लगातार कमजोर होती गई।


२००४ में हटाई गई कार्यकाल सीमा


लुकाशेंको की सत्ता को स्थायी बनाने वाला अगला बड़ा कदम २००४ में आया।


एक और जनमत-संग्रह के जरिए राष्ट्रपति के लिए निर्धारित दो कार्यकालों की संवैधानिक सीमा हटा दी गई। इसके बाद लुकाशेंको लगातार चुनाव लड़ते और जीतते रहे।


यही वह तथ्य है जिसके कारण अक्सर लुकाशेंको की तुलना उन दूसरे नेताओं से की जाती है जिन्होंने संवैधानिक बदलावों के जरिए सत्ता में बने रहने की अपनी संभावनाएं बढ़ाईं।


रूस में व्लादिमीर पुतिन के लिए २०२० के संवैधानिक संशोधनों ने उनके पहले के कार्यकालों को नए तरीके से गिनने की व्यवस्था बनाई, जबकि चीन में २०१८ में राष्ट्रपति के लगातार दो कार्यकालों की सीमा हटा दी गई।


लेकिन यहां एक सावधानी जरूरी है। यह कहना कि पुतिन या शी चिनफिंग ने सीधे लुकाशेंको से “तानाशाही के गुर सीखे” या लुकाशेंको उनके “गुरु” थे, ऐतिहासिक प्रमाण से अधिक एक राजनीतिक व्यंग्य या तुलना है। तीनों देशों में सत्ता के केंद्रीकरण की प्रक्रियाओं में समानताएं जरूर दिखाई देती हैं, लेकिन प्रत्यक्ष गुरु-शिष्य संबंध का प्रमाण नहीं है।


चुनाव होते रहे, लेकिन सवाल भी उठते रहे


बेलारूस में नियमित रूप से राष्ट्रपति चुनाव होते रहे हैं, लेकिन चुनावी प्रक्रिया को लेकर अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की गंभीर आपत्तियां लंबे समय से दर्ज होती रही हैं।


२००१ के चुनाव में अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने परिणामों की पारदर्शिता पर सवाल उठाए। २००६ और २०१० के चुनावों में भी चुनावी प्रक्रिया, मीडिया की स्वतंत्रता, विपक्ष के लिए समान अवसर और मतगणना को लेकर गंभीर कमियां दर्ज की गईं।


२०१० के चुनाव के बाद मिंस्क में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए और सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों तथा विपक्षी कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की।


इस तरह चुनावी विवाद और उसके बाद दमन बेलारूसी राजनीति का बार-बार दोहराया जाने वाला पैटर्न बन गया।


२०२०: जब बेलारूस की सड़कों पर उमड़ा अभूतपूर्व विरोध


लुकाशेंको के शासन को सबसे बड़ी चुनौती २०२० में मिली।


राष्ट्रपति चुनाव में लुकाशेंको को आधिकारिक रूप से लगभग ८० प्रतिशत वोट मिले और स्वेतलाना तिखानोव्स्काया को लगभग १० प्रतिशत।


लेकिन विपक्ष ने परिणामों को स्वीकार नहीं किया। बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू हुए और देश के कई शहरों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए।


तिखानोव्स्काया मूल रूप से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार नहीं थीं। उनके पति सियारहेई तिखानोव्स्की को चुनाव लड़ने से पहले गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके बाद उन्होंने स्वयं चुनाव मैदान में उतरने का निर्णय लिया और विपक्षी समूहों के बीच एक व्यापक गठबंधन का चेहरा बन गईं।


उनकी रैलियों में बड़ी भीड़ जुटी और चुनाव परिणामों के बाद उन्होंने मतगणना में बड़े पैमाने पर धांधली का आरोप लगाया।


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी २०२० के चुनाव की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठे। उसके बाद सरकार ने विपक्ष, स्वतंत्र पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई की।


हजारों लोग गिरफ्तार हुए और विपक्ष के प्रमुख नेताओं को जेल या निर्वासन का सामना करना पड़ा।


लुकाशेंको और रूस का रिश्ता


लुकाशेंको की राजनीति को समझने के लिए रूस के साथ बेलारूस के संबंधों को समझना बेहद जरूरी है।


१९९९ में रूस और बेलारूस ने संघ-राज्य की स्थापना के लिए समझौता किया। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग को गहरा करना था।


हालांकि बेलारूस रूस में विलय नहीं हुआ।


रूस की ओर से समय-समय पर दोनों देशों के और अधिक एकीकरण की इच्छा दिखाई गई, जबकि लुकाशेंको ने सामान्यतः इतनी गहराई तक जाने से बचने की कोशिश की कि बेलारूस की संप्रभुता समाप्त होती दिखाई दे।


दिलचस्प बात यह है कि लुकाशेंको ने कई वर्षों तक रूस और पश्चिम के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की। जब मॉस्को से संबंध तनावपूर्ण होते थे, तब वे यूरोप और अमेरिका के साथ संबंध सुधारने की कोशिश करते थे। और जब पश्चिमी दबाव बढ़ता था, तब रूस बेलारूस के लिए आर्थिक और राजनीतिक सहारा बन जाता था।


इसी रणनीति ने उन्हें लंबे समय तक दोनों पक्षों के बीच अपनी स्थिति बनाए रखने में मदद की।


२०१४ के बाद रूस से दूरी और पश्चिम से नजदीकी


यूक्रेन संकट और २०१४ में रूस द्वारा क्रीमिया पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद लुकाशेंको ने मॉस्को से अपनी कुछ दूरी प्रदर्शित की।


उन्होंने यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता के पक्ष में बयान दिए और बेलारूस को रूस तथा पश्चिम के बीच संभावित संवाद के लिए एक मध्यस्थ की भूमिका में पेश करने की कोशिश की।


इसके बाद यूरोपीय संघ ने बेलारूस पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों में ढील दी।


लेकिन यह दूरी स्थायी नहीं रही।


तेल और गैस की कीमतों, आर्थिक संबंधों और दोनों देशों के एकीकरण को लेकर रूस और बेलारूस के बीच कई बार विवाद हुए। २०१९ और २०२० के आसपास तेल आपूर्ति और कीमतों को लेकर तनाव भी सामने आया।


लुकाशेंको के लिए यह संबंध हमेशा एक संतुलन का खेल रहा—रूस से आर्थिक और सुरक्षा सहयोग भी चाहिए था, लेकिन बेलारूस की राजनीतिक स्वायत्तता भी बनाए रखनी थी।


२०२० के बाद संतुलन लगभग खत्म हो गया


२०२० के चुनाव और उसके बाद हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों ने लुकाशेंको और पश्चिम के बीच संबंधों को लगभग पूरी तरह बदल दिया।


जब पश्चिमी देशों ने चुनाव और सरकार की कार्रवाई पर प्रतिबंध लगाए, तब रूस ने लुकाशेंको को राजनीतिक और आर्थिक समर्थन दिया।


राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने २०२० के संकट के दौरान लुकाशेंको के समर्थन में स्पष्ट रुख अपनाया और रूस ने बेलारूस को आर्थिक सहायता भी दी।


इसके बाद बेलारूस की रूस पर निर्भरता बढ़ती चली गई।


२०२२ में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के समय बेलारूस ने रूसी सेना को अपने क्षेत्र के उपयोग की अनुमति दी। बेलारूस स्वयं रूस के साथ युद्ध में अपनी नियमित सेना के रूप में शामिल नहीं हुआ, लेकिन उसका भूगोल और सैन्य सहयोग रूस के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।


बाद के वर्षों में रूस ने बेलारूस में सामरिक परमाणु हथियार भी तैनात किए।


इससे दोनों देशों के बीच सैन्य और सुरक्षा संबंध पहले की तुलना में कहीं अधिक गहरे हो गए।


२०२५ का चुनाव: लुकाशेंको की सातवीं जीत


मूल लेख २०२० के चुनाव पर समाप्त हो जाता है, लेकिन कहानी वहां खत्म नहीं हुई।


२६ जनवरी २०२५ को बेलारूस में अगला राष्ट्रपति चुनाव हुआ। आधिकारिक परिणामों के अनुसार लुकाशेंको को लगभग ८६.८ प्रतिशत वोट मिले और वे सातवीं बार राष्ट्रपति चुने गए।


लेकिन इस चुनाव को लेकर भी गंभीर विवाद रहा। प्रमुख विपक्षी नेता या तो जेल में थे, निर्वासन में थे या चुनावी प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिए गए थे। यूरोपीय देशों और अन्य पश्चिमी सरकारों ने चुनाव को स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं माना।


इस बार एक और महत्वपूर्ण बात हुई। बेलारूस ने यूरोप में सुरक्षा और सहयोग संगठन के स्वतंत्र चुनाव पर्यवेक्षकों को चुनाव की निगरानी के लिए आमंत्रित नहीं किया। इसके कारण स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षण संभव नहीं हो सका।


इसलिए २०२० के बाद भी बेलारूस की चुनावी राजनीति में मूल विवाद समाप्त नहीं हुआ।


आज लुकाशेंको की सबसे बड़ी ताकत क्या है?


लुकाशेंको के तीन दशक से अधिक लंबे शासन को केवल व्यक्तिगत राजनीतिक चालाकी से समझना पर्याप्त नहीं होगा।


उनकी सत्ता कई स्तंभों पर टिकी रही है।


पहला, राष्ट्रपति के हाथों में सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण।


दूसरा, विपक्ष और स्वतंत्र मीडिया पर लगातार दबाव।


तीसरा, सुरक्षा और प्रशासनिक तंत्र पर मजबूत नियंत्रण।


चौथा, राज्य-प्रधान अर्थव्यवस्था का ऐसा ढांचा जिसमें सरकार का प्रभाव बहुत बड़ा है।


और पांचवां, रूस से मिलने वाला आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य समर्थन।


बेलारूस रूस की तुलना में छोटा देश है और उसकी अर्थव्यवस्था लंबे समय से रूसी बाजार, ऊर्जा और वित्तीय सहयोग से गहराई से जुड़ी रही है। इसलिए रूस के साथ संबंध लुकाशेंको के लिए केवल विदेश नीति का विषय नहीं, बल्कि सत्ता की स्थिरता का भी महत्वपूर्ण आधार हैं।


क्या लुकाशेंको बेलारूस को रूस में मिला देंगे?


यह आशंका बेलारूस की राजनीति में लंबे समय से मौजूद है।


रूस और बेलारूस के बीच संघ-राज्य की व्यवस्था है और दोनों देशों के सैन्य तथा आर्थिक संबंध पहले से कहीं अधिक गहरे हैं। लेकिन बेलारूस का औपचारिक रूप से रूस में विलय अभी तक नहीं हुआ है।


लुकाशेंको स्वयं कई बार बेलारूस की संप्रभुता की बात कर चुके हैं।


दूसरी ओर, रूस के साथ बढ़ता आर्थिक और सैन्य एकीकरण इस सवाल को लगातार जीवित रखता है कि भविष्य में बेलारूस अपनी स्वतंत्र विदेश और सुरक्षा नीति कितनी स्वतंत्रता से चला पाएगा।


यही कारण है कि बेलारूस के भीतर रूस के साथ संबंधों को लेकर राय एक जैसी नहीं है। कुछ लोग रूस के साथ निकट संबंधों को सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का आधार मानते हैं, जबकि विपक्षी धड़े को आशंका है कि अत्यधिक एकीकरण से बेलारूस की राष्ट्रीय संप्रभुता और राजनीतिक पहचान कमजोर हो सकती है।


लुकाशेंको की कहानी का असली महत्व


अलेक्जेंडर लुकाशेंको की कहानी केवल एक लंबे समय तक सत्ता में बने रहने वाले राष्ट्रपति की कहानी नहीं है।


यह उस राजनीतिक मॉडल की कहानी है जिसमें चुनाव मौजूद रहते हैं, लेकिन सत्ता का वास्तविक संतुलन राष्ट्रपति के पक्ष में लगातार झुकता जाता है।


१९९४ में पहली बार राष्ट्रपति बने लुकाशेंको ने संवैधानिक बदलावों, जनमत-संग्रहों और राजनीतिक संस्थाओं के पुनर्गठन के जरिए राष्ट्रपति पद को मजबूत किया। २०२० के बाद रूस पर उनकी निर्भरता और बढ़ी और २०२५ में उन्होंने आधिकारिक परिणामों के अनुसार अपना सातवां राष्ट्रपति चुनाव जीत लिया।


इसलिए उन्हें केवल “पुतिन और शी चिनफिंग का गुरु” कहना आकर्षक राजनीतिक व्यंग्य हो सकता है, लेकिन इतिहास की दृष्टि से तस्वीर इससे कहीं अधिक जटिल है।


लुकाशेंको ने जिस व्यवस्था को बेलारूस में विकसित किया, वह सोवियत विरासत, कमजोर लोकतांत्रिक संस्थाओं, राष्ट्रपति-केंद्रित शासन, राज्य नियंत्रण और रूस के साथ गहरे संबंधों के मेल से बनी है।


और आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि लुकाशेंको कितने चुनाव जीत चुके हैं।


सवाल यह है कि उनके बाद बेलारूस की राजनीतिक व्यवस्था कैसी होगी— और रूस के साथ उसका संबंध किस दिशा में जाएगा।


—मूल आलेख एवं विषय-विचार: धर्मेंद्र कुमार

पुनर्लेखन, तथ्य-जाँच एवं संपादकीय प्रस्तुति: आखरवाणी संपादकीय


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