सृष्टि को किसने बनाया? ईश्वर और ब्रह्मांड की उत्पत्ति का तर्क
सृष्टि को किसने बनाया?
ईश्वरवादियों द्वारा ईश्वर के अस्तित्व के पक्ष में दिए जाने वाले सभी तर्कों में सबसे पुराना और शायद सबसे सामान्य तर्क है—इस सृष्टि को किसने बनाया? क्या यह स्वतः बन गई? लेकिन स्वतः तो कुछ भी बनता नहीं। हर रचना का कोई न कोई रचनाकार अवश्य होता है। इतनी विविधतापूर्ण सृष्टि तो स्वतः कतई नहीं बन सकती। अवश्य ही इस सृष्टि का कोई न कोई रचनाकार है और वही ईश्वर है।इसमें कोई संदेह नहीं कि यह ब्रह्मांड तमाम हैरतंगेज चीजों से भरा पड़ा है, जो हमें बरबस सोचने के लिए विवश करती हैं। धरती पर ही कदम-कदम पर हम रोजाना तमाम आश्चर्यों से दो-चार होते रहते हैं। और फिर रात के अथाह आकाश में जगमगाते असंख्य तारों को देखकर आखिर कौन है जो ब्रह्मांड की इस भव्यता पर मुग्ध न हो जाए?
इस ब्रह्मांड के रहस्यों के आगे हमारे मस्तिष्क की तर्कशक्ति शीघ्र ही समर्पण कर देती है और हम कल्पनाओं के मायाजाल में खो जाते हैं। कल्पनाओं के इसी मायाजाल में हमारी भेंट ईश्वर से होती है।
ईश्वर चूँकि हमारी उन जिज्ञासाओं का एक फौरी समाधान दे देता है, जिनका कोई अन्य समाधान हमें तत्काल उपलब्ध नहीं होता, इसलिए हम उसे तुरंत स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन इस समाधान को पाने की खुशी में हम यह विचार करना बिल्कुल भूल जाते हैं कि ईश्वर ने जो समाधान दिया है, वह वास्तव में एक अन्य और उससे भी बड़ी समस्या को जन्म दे रहा है।
ब्रह्मांड के रचनाकार के रूप में ईश्वर की कल्पना कर लेने से ब्रह्मांड के अस्तित्व की गुत्थी सुलझती नहीं, बल्कि और उलझ जाती है। आइए देखें कैसे।
रचनाकार को किसने बनाया?
ईश्वरवादियों द्वारा एक उदाहरण अक्सर दिया जाता है—कुंभ और कुम्हार का। वे कहते हैं कि मिट्टी स्वतः कुंभ अर्थात घड़े का निर्माण नहीं कर सकती। कुंभ का निर्माण बिना कुम्हार के नहीं हो सकता।
यहाँ मिट्टी पदार्थ है, कुंभ रचना और कुम्हार रचनाकार। मिट्टी पदार्थ की एक अव्यवस्थित अवस्था है, जबकि कुंभ उसी मिट्टी की एक व्यवस्थित अवस्था है। यहाँ तर्क दिया जाता है कि कोई भी व्यवस्था बिना किसी व्यवस्थापक के अस्तित्व में नहीं आ सकती।
यह तर्क कुंभ और जीवों द्वारा निर्मित चीजों पर तो ठीक बैठता है, लेकिन जब इसी तर्क को ब्रह्मांड पर लागू किया जाता है तो एक बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है, क्योंकि यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य को अनदेखा कर दिया गया है।
व्यवस्थापक भी स्वयं एक व्यवस्था है। और इसी तर्क के अनुसार वह भी बिना किसी व्यवस्थापक के अस्तित्व में नहीं आ सकता।
लेकिन समस्या का अंत यहीं नहीं होता। कुंभ का निर्माण करने वाला कुम्हार, छत्ते का निर्माण करने वाली मधुमक्खी या खूबसूरत घोंसले का निर्माण करने वाली गौरैया अपने द्वारा निर्मित की जाने वाली रचना से कहीं अधिक जटिल रूप से व्यवस्थित हैं। उनकी स्वयं की जटिलता की तुलना में उनके द्वारा निर्मित रचना बेहद सरल है।
यदि यह मान लिया जाए कि रचनाकार अपनी रचना की तुलना में अधिक जटिल होता है, तो फिर ब्रह्मांड जैसी अत्यंत जटिल रचना का रचनाकार तो उससे भी कहीं अधिक जटिल होना चाहिए। प्रकृति की जटिल व्यवस्थाओं की दुहाई देकर ही ईश्वरवादी एक बुद्धिमान रचनाकार के अस्तित्व का दावा करते हैं। लेकिन इतने जटिल रचनाकार का कोई रचनाकार न होना इस तर्क को आत्मविरोधाभासी बना देता है।
प्राकृतिक चयन ने बदला सवाल
ईश्वरवादियों ने अपने पक्ष को साबित करने के लिए विगत सदियों में तमाम बड़े-बड़े दर्शनग्रंथों और तर्कशास्त्रों की रचना की। बावजूद इसके यह समस्या ईश्वरवादियों के लिए दुस्वप्न ही बनी रही।
इस गुत्थी को सुलझाने के लिए तमाम बुद्धिजीवी और दार्शनिक सदियों तक बहस करते रहे, लेकिन इस प्रश्न का कोई ठोस उत्तर नहीं दे सके कि आखिर कोई जटिल व्यवस्था बिना किसी बौद्धिक हस्तक्षेप के स्वतः कैसे अस्तित्व में आ सकती है।
इसे सुलझाने की दिशा में पहली बड़ी आशा की किरण लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व चार्ल्स डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत के रूप में सामने आई।
प्राकृतिक चयन के सिद्धांत द्वारा पहली बार यह वैज्ञानिक ढंग से समझना संभव हुआ कि प्रकृति बिना किसी बौद्धिक हस्तक्षेप के जैव विविधताओं को आकार देने में सक्षम है। डार्विन द्वारा प्रस्तुत प्राकृतिक चयन का सिद्धांत वास्तव में बेहद क्रांतिकारी विचार सिद्ध हुआ। इसने पारंपरिक सोच के ढाँचे को बदलकर मानव चेतना को एक नए आयाम तक पहुँचा दिया, क्योंकि संपूर्ण मानव इतिहास में हम पहली बार यह समझने में सक्षम हुए कि चीजें इस ढंग से भी घटित हो सकती हैं।
इससे पहले हम यह सोच ही नहीं सकते थे कि बिना किसी बुद्धिमान निर्माता के कोई जटिल रचना केवल प्राकृतिक नियमों के सहारे स्वतः कैसे विकसित हो सकती है।
आज हम जानते हैं कि प्राकृतिक चयन को अपना काम करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाए तो वह एक अत्यंत सरल प्रारंभिक जीवन-रूप से शुरू होकर करोड़ों-करोड़ों वर्षों में अत्यंत जटिल जीवों के विकास की प्रक्रिया को संभव बना सकता है—यहाँ तक कि ऐसा जीव भी विकसित हो सकता है जो स्वयं यह प्रश्न पूछ सके कि यह ब्रह्मांड कैसे बना।
लेकिन पहला जीवन कैसे बना?
अब यहाँ कोई पूछ सकता है कि माना प्राकृतिक चयन सरल जीवन-रूपों को जटिल जीवों के रूप में विकसित कर सकता है, लेकिन उसे काम करने के लिए सरल ही सही, एक जीवन-रूप चाहिए ही। और सरल से सरल जीवन-रूप भी, सरल ही सही, एक व्यवस्था है।
साथ ही ब्रह्मांडीय नियम, जिनके कारण यह ब्रह्मांड अस्तित्व में आया और वे प्राकृतिक नियम, जिनके कारण प्राकृतिक चयन को अपना काम करने का अवसर मिलता है, स्वयं एक व्यवस्था हैं। तो यह व्यवस्था कैसे अस्तित्व में आई?
सर्वप्रथम जीवन की बात करते हैं।
जीवन की उत्पत्ति के विषय में हम जितना अभी तक समझ पाए हैं, उसके अनुसार जीवन के सबसे सरल प्रारंभिक रूपों में से एक ऐसा अणु रहा होगा जो अपनी प्रतिकृति बनाने में सक्षम था। हमने जीवन के लिए आवश्यक अनेक जैव-रासायनिक घटकों की पहचान की है और यह भी समझा है कि उन रसायनों का निर्माण पृथ्वी के आरंभिक वातावरण में संभव था।
लेकिन उन सभी रसायनों का आपस में इस तरह व्यवस्थित होना कि अपनी प्रतिकृति बनाने में सक्षम एक स्वचालित व्यवस्था का निर्माण हो सके, एक बेहद दुर्लभ संयोग रहा होगा।
मोटे तौर पर आप इसे कुछ ऐसा समझ सकते हैं जैसे कोई अंधा व्यक्ति सैकड़ों टुकड़ों वाली किसी जिग्सॉ पहेली के टुकड़ों को जोड़ने का प्रयास करे और अंततः उसे बिल्कुल सही ढंग से जोड़ने में सफल हो जाए।
यह लगभग असंभव प्रतीत हो सकता है। लेकिन गणित की दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ और अत्यंत कम प्रायिकता वाली घटना को भी केवल इसलिए असंभव नहीं कहा जा सकता कि उसकी संभावना बहुत कम है।

प्रायिकता और समय का सवाल
गणित में प्रायिकता का अर्थ है किसी घटना के घटित होने की संभावना। उदाहरण के लिए, यदि आप एक मानक ताश की गड्डी में से किसी एक विशेष पत्ते को यादृच्छिक रूप से निकालते हैं, तो उसके निकलने की संभावना 1/52 होती है।
हालाँकि इसका यह अर्थ नहीं है कि 52 प्रयास करने पर वह पत्ता निश्चित रूप से एक बार निकल ही जाएगा। हर प्रयास स्वतंत्र होता है और सफलता किसी भी प्रयास में मिल सकती है। प्रायिकता हमें किसी घटना के घटित होने की संभावना के बारे में बताती है, उसकी निश्चित समय-सीमा के बारे में नहीं।
इसी तरह, किसी जिग्सॉ पहेली के टुकड़ों को आँखों पर पट्टी बाँधकर सही ढंग से व्यवस्थित करने की संभावना बेहद कम हो सकती है। संभव है कि कोई व्यक्ति जीवन भर प्रयास करता रहे और फिर भी सफल न हो।
लेकिन क्या हो यदि उसके पास जीवन भर नहीं, बल्कि करोड़ों वर्ष हों? और क्या हो यदि इस प्रयास में एक नहीं, बल्कि असंख्य संभावित संयोजन लगातार बनते-बिगड़ते रहें?
यहीं समय और असंख्य रासायनिक अंतःक्रियाओं का महत्व सामने आता है।
पृथ्वी पर पाए गए जीवन के सबसे प्राचीन साक्ष्य लगभग 3.8 अरब वर्ष पुराने माने जाते हैं, जबकि पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष है। अर्थात जीवन की उत्पत्ति के लिए पृथ्वी के आरंभिक इतिहास में एक बहुत लंबा समय उपलब्ध था।
इस दौरान समुद्रों और वातावरण में मौजूद कार्बनिक यौगिकों के असंख्य अणु लगातार रासायनिक प्रतिक्रियाओं में भाग लेते रहे होंगे। अंततः उन परिस्थितियों में ऐसा संयोजन संभव हुआ, जिसने जीवन के विकास की आगे की प्रक्रिया के लिए आधार तैयार किया।
धरती पर यह संयोग घटित हो सका, इसकी एक वजह यह भी है कि धरती पर वे परिस्थितियाँ मौजूद थीं जिनमें जीवन के लिए आवश्यक रासायनिक प्रक्रियाएँ संभव थीं। निस्संदेह हमारी पृथ्वी इस मामले में विशेष है।
क्या पृथ्वी को किसी ने जीवन के लिए बनाया?
पृथ्वी पर मौजूद जीवन जैसा जीवन किसी अन्य ग्रह पर उत्पन्न हो सके, इसके लिए आवश्यक है कि वह ग्रह जीवन की उत्पत्ति के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ उपलब्ध कराता हो। इनमें एक महत्वपूर्ण आवश्यकता तरल जल की उपस्थिति है।
ऐसा तभी संभव है जब कोई ग्रह अपने तारे से ऐसी दूरी पर स्थित हो जहाँ तापमान उस सीमा में रहे जिसमें पानी तरल अवस्था में मौजूद रह सके। इस क्षेत्र को गोल्डीलॉक्स क्षेत्र कहा जाता है।
गोल्डीलॉक्स क्षेत्र किसी तारे के आसपास मौजूद वह काल्पनिक वलयाकार क्षेत्र है जहाँ परिस्थितियाँ तरल जल के अस्तित्व के लिए अनुकूल हो सकती हैं। हमारी पृथ्वी भी सूर्य से ऐसी ही उपयुक्त दूरी पर स्थित है।
इसके साथ ही पृथ्वी की कई अन्य विशेषताएँ भी हैं, जैसे पथरीली सतह, चुंबकीय क्षेत्र से निर्मित विकिरण-कवच और विभिन्न गैसों से समृद्ध वायुमंडल।
पृथ्वी की इन्हीं विशेषताओं के आधार पर कुछ लोग कहते हैं कि पृथ्वी की ये परिस्थितियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि इसे किसी बुद्धिमान रचनाकार ने बनाया है। लेकिन उनका यह तर्क भी उतना मजबूत नहीं है जितना पहली नजर में दिखाई देता है।
पृथ्वी को किसी बुद्धिमान रचनाकार द्वारा निर्मित होने के तर्क को तब स्वीकार करना आसान होता, यदि ब्रह्मांड में केवल हमारा ही सौरमंडल मौजूद होता। लेकिन हमारे सामने तो तारों और ग्रहों की असंख्य संख्या है।
यदि इतने विशाल ब्रह्मांड में ग्रहों की बहुत बड़ी संख्या में से कुछ ग्रह ऐसी परिस्थितियाँ उपलब्ध कराते हों जो जीवन के अनुकूल हों, तो क्या उनका अस्तित्व किसी बुद्धिमान रचनाकार का प्रमाण माना जाएगा या फिर विशाल संख्या में होने वाली संभावनाओं में से एक स्वाभाविक परिणाम?
अब सवाल ब्रह्मांड पर आता है
सब जगह से निराश होने के बाद ईश्वरवादियों की अंतिम उम्मीद ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर जाकर ठहर जाती है। लेकिन अफसोस, यहाँ से भी उन्हें कोई स्पष्ट राहत मिलती नजर नहीं आती।
ब्रह्मांड एक जटिल व्यवस्था लगता है, लेकिन भौतिक विज्ञानियों ने ब्रह्मांड को अब तक जितना समझा है, उसके अनुसार ब्रह्मांड का अस्तित्व कुछ मूलभूत नियमों पर टिका है।
इन मूलभूत नियमों से जुड़े कुछ मान ऐसे हैं जिनका ब्रह्मांड की संरचना और उसके विकास पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इन्हें हम स्थिरांक के रूप में जानते हैं।
ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसके इस तरह विकसित होने के लिए कि उसमें जीवन के अनुकूल परिस्थितियाँ बन सकें, कुछ मूलभूत स्थिरांकों के मानों का एक विशेष सीमा में होना आवश्यक है। यदि इन मानों में पर्याप्त अंतर हो तो ब्रह्मांड का विकास बिल्कुल अलग ढंग से हो सकता है।
उदाहरण के लिए, नाभिक को बाँधकर रखने वाली प्रबल नाभिकीय शक्ति के मान में परिवर्तन होने पर तारों के भीतर होने वाली नाभिकीय प्रक्रियाएँ और तत्वों का निर्माण प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में जीवन के लिए आवश्यक परिस्थितियों का बनना कठिन हो सकता है।
तो क्या इन स्थिरांकों के मान को किसी बुद्धिमान ईश्वर ने इस तरह निर्धारित किया था कि यह ब्रह्मांड अस्तित्व में आ सके?
क्या हमारा ब्रह्मांड ही एकमात्र ब्रह्मांड है?
यहाँ एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है।
हम जिस ब्रह्मांड में मौजूद हैं, वह जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध कराता है। लेकिन हमारे पास यह मानने का कोई निश्चित आधार नहीं है कि यही एकमात्र संभव ब्रह्मांड है या यही एकमात्र ब्रह्मांड है जो कभी अस्तित्व में आया।
संभव है कि इससे पहले भी न जाने कितने अलग-अलग प्रकार के ब्रह्मांड अस्तित्व में आए हों और नष्ट हो चुके हों। यह भी संभव है कि अनेक प्रकार के ब्रह्मांड एक साथ अस्तित्व में हों।
यदि ऐसा है तो हमारे ब्रह्मांड के जीवन-अनुकूल होने को किसी बुद्धिमान रचनाकार की योजना मानना आवश्यक नहीं रह जाता। यह अनेक संभावनाओं में से एक परिणाम भी हो सकता है।
लेकिन तब भी एक सवाल बचा रहता है—वे कारण क्या हैं जो किसी ब्रह्मांड को जन्म देते हैं?
अंतिम सवाल का जवाब अभी बाकी है
ब्रह्मांड की उत्पत्ति के कारणों को खोजने के लिए सर्वप्रथम हमें प्रकृति के मूलभूत नियमों की एक व्यापक और एकीकृत समझ विकसित करनी होगी। शायद भविष्य में जब हम ऐसा कोई एकीकृत सिद्धांत खोज लेंगे, तब हम समझ सकेंगे कि वे कौन-से कारण हैं जो किसी ब्रह्मांड को जन्म दे सकते हैं।
और तब हो सकता है कि जिस तरह प्राकृतिक चयन के सिद्धांत ने हमारी चेतना को एक नए आयाम तक पहुँचाकर हमें जीवों की उत्पत्ति और विकास को समझने योग्य बनाया था, उसी तरह कोई नया सिद्धांत हमें ब्रह्मांड की उत्पत्ति के कारणों को समझने योग्य बना दे।
हो सकता है वह घड़ी शीघ्र आए जब हम उन कारणों को समझ सकें।
लेकिन अब आप इतना समझने योग्य तो हो ही गए हैं कि वह अंतिम कारण कुछ भी हो, एक बुद्धिमान रचनाकार होना आवश्यक नहीं है।
नोट : इस तरह की जानकारियों से भरे वीडियो आप मेरे यूट्यूब चैनल Arpit Explains पर भी देख सकते हैं।






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